द्ब्रूगढ़, असम। ब्रह्मपुत्र नदी, जो पूर्वी भारत की जीवनधार मानी जाती है, न केवल भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता को भी समृद्ध करती है। यह नदी अपने उद्गम स्थल माउंट कैलाश और मानसरोवर झील से निकलकर तिब्बत के रास्ते भारत के अरुणाचल प्रदेश और असम से गुजरती हुई बंगाल की खाड़ी में मिलती है।
ब्रह्मपुत्र नदी को स्थानीय लोग एक दिव्य अस्तित्व के रूप में पूजते हैं। नदी का नाम भगवान ब्रह्मा के पुत्र के रूप में रखा गया है, जो इस क्षेत्र की धार्मिक आस्था का केंद्र है। असम में स्थित ब्रह्मपुत्र का ये सशक्त रूप न केवल जल संग्रह का स्रोत है, बल्कि यह कृषि, मत्स्य पालन और दैनिक जीवन का आधार भी है।
जनवरी 2025 में राज्य के विभिन्न हिस्सों में यात्रा के दौरान हमने देखा कि यहाँ की जनजातियाँ और विभिन्न समुदाय इस नदी को भगवान की तरह मानते हैं। अरुणाचल प्रदेश के सियांग, लोहि और दिबांग नदियाँ मिलकर ब्रह्मपुत्र का रूप लेती हैं। इस क्षेत्र के लोग नदी की रक्षा और स्वच्छता को सर्वोपरि मानते हैं, हालांकि वर्तमान दिनों में नदी पर बने जलविद्युत परियोजनाओं और प्रदूषण की चुनौतियाँ बढ़ती जा रही हैं।
ब्रह्मपुत्र पर बना बोगीबील पुल, जो भारत का सबसे लंबा सड़क और रेल पुल है, आर्थिक विकास के साथ-साथ सैन्य दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इसके अलावा असम की माजुली द्वीप, जो दुनिया का सबसे बड़ा फलैuvial द्वीप है, नदी के जल-स्रोत के प्रति लोगों की आस्था और संस्कृति का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है।
माजुली द्वीप पर वैष्णव संप्रदाय के सत्तरा समुदाय कृष्ण भक्ति के माध्यम से सांस्कृतिक ऋद्धि-समृद्धि को बढ़ावा देते हैं। यहां की प्राकृतिक संपदा और पारंपरिक कला, जैसे मिट्टी के बर्तन बनाना एवं धार्मिक नृत्य-नाटकों की परंपरा से जुड़ी है।
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और टाइगर रिजर्व, ब्रह्मपुत्र के किनारे बसा एक विश्व प्रसिद्ध स्थल है, जहां भारतीय गैंडे, बाघ और अन्य वन्यजीवों की सुरक्षा एवं संरक्षण किया जाता है। यहां की जैव विविधता ब्रह्मपुत्र नदी की खोदाई और कटाव द्वारा निर्मित जल-भूमि पर निर्भर है।
असम में ब्रह्मपुत्र के तट पर स्थित कामाख्या मंदिर, जो शक्ति पीठों में से एक है, धार्मिक आस्था का केंद्र है। मंदिर की स्थापना ब्रह्मपुत्र के साथ जुड़ी देवी ऊर्जा के सम्मान में की गई है और यहाँ हर वर्ष लाखों श्रद्धालु जल स्नान करते हैं।
इस सम्पूर्ण यात्रा में हमने पाया कि ब्रह्मपुत्र मात्र एक नदी नहीं है, बल्कि यह इस क्षेत्र की सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक जीवनधारा है। भले ही विकास के काम तेज हो रहे हों, लेकिन लोग इस नदी को जीवित देवता समझते हुए उसकी सुरक्षा और सम्मान की मांग करते हैं।
अंततः ब्रह्मपुत्र भारतीय उपमहाद्वीप का ऐसा स्रोत है जो न केवल जीवन को सजीव बनाता है, बल्कि विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों के लोगों को एक सूत्र में बांधता है। इसकी गंगा और सिंधु के बाद तीसरी सबसे महत्वपूर्ण नदी होने के नाते, यह निस्तेज नहीं बल्कि प्रेरणा की स्रोत बनी हुई है।

