अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में भारत और चीन की जन्मसिद्ध नागरिकता (Birthright Citizenship) की नीतियों को लेकर एक विवादास्पद टिप्पणी की है। ट्रंप ने इन देशों की नागरिकता प्रणालियों पर तीखा हमला करते हुए कहा कि ये नीतियां एक बड़े धोखे का हिस्सा हैं। उनका आरोप है कि इन देशों की नागरिकता व्यवस्थाएं एक तरह से कानून में खामी पैदा करती हैं, जिसका दुरुपयोग करके वे लोग अमेरिका में अपनी पूरी फैमिली को लाने में सक्षम हो जाते हैं।
इस टिप्पणी के पीछे ट्रंप की मंशा थी कि बच्चों के माध्यम से तुरंत नागरिकता प्राप्ति की प्रक्रिया से बड़े परिवारों को अमेरिका में आने की छूट मिल जाती है। ट्रंप ने अपनी ट्वीट में कहा, “यहाँ एक बच्चा वहां तत्काल नागरिक बन जाता है, और फिर वे अपनी पूरी फैमिली को चीन या भारत या किसी अन्य पृथ्वी पर नरक जैसी जगह से लाते हैं।” इस बयान ने भारत और चीन की जन्मसिद्ध नागरिकता नीति पर फिर से बहस छेड़ दी है।
जन्मसिद्ध नागरिकता का मतलब है कि किसी भी बच्चे को जिस देश में जन्म होता है, वह बिना किसी अतिरिक्त शर्तों के उस देश का नागरिक माना जाता है। दुनियाभर में कई देशों में यह कानून दिया गया है, जिसमें अमेरिका भी शामिल है। लेकिन ट्रंप ने इस नियम को लेकर अपनी आपत्ति जताई और इसे दुरुपयोग का माध्यम बताया।
विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप का यह बयान कई मायनों में विवादास्पद और संवेदनशील है, क्योंकि यह कई देशों के सामाजिक और कानूनी ढांचे को सीधे तौर पर चुनौती देता है। भारत में नागरिकता का मसला बहुत ही जटिल और राजनीतिक रूप से संवेदनशील है। जबकि चीन में जन्मसिद्ध नागरिकता की नीति कुछ अलग है, लेकिन ट्रंप ने दोनों देशों को एक ही संदर्भ में लेकर अपनी आपत्ति जाहिर की।
ट्रंप की आलोचना से यह सवाल उठता है कि क्या जन्मसिद्ध नागरिकता के नियम को बदलने और उसमें सुधार करने की जरूरत है या इससे जुड़े किसी संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए उचित कदम उठाए जाने चाहिए। कुछ लोगों का मानना है कि इससे देशों को फायदा तो हो सकता है, लेकिन इंसानों के अधिकारों और मानवीय मूल्यों के मद्देनजर इसे सावधानी से देखा जाना चाहिए।
इस वाद-विवाद के बीच, भारत और चीन दोनों सरकारों ने अभी तक ट्रंप के उस बयान पर आधिकारिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि इस मुद्दे को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक चर्चा और समझौते की जरूरत है ताकि सभी देशों के हित और नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रह सकें।
ट्रंप के इस बयान ने एक बार फिर वैश्विक नागरिकता नीतियों और मानवाधिकार के मुद्दों पर नए सिरे से ध्यान आकर्षित किया है। आने वाले दिनों में इस विषय पर सामाजिक और राजनीतिक प्लेटफॉर्म पर जुबानी जंग और बहस जारी रहने की संभावना है।

