पश्चिम बंगाल में आगामी 2026 के विधानसभा चुनावों को लेकर केंद्रीय विश्वविद्यालय के कई शिक्षकों ने अपनी मुश्किलों का उल्लेख किया है। उन्होंने बताया कि लगातार विभिन्न जिलों में चुनाव संबंधित कार्य में तैनाती के कारण वे “अत्यधिक मानसिक और शारीरिक तनाव” का सामना कर रहे हैं। यह स्थिति न केवल उनकी सेहत पर विपरीत प्रभाव डाल रही है, बल्कि उनकी शैक्षणिक जिम्मेदारियों को भी प्रभावित कर रही है।
विद्वानों का कहना है कि चुनावी कार्य के दौरान आवश्यक तैयारी, मतदान केंद्रों पर ड्यूटी, मतगणना और अन्य प्रशासनिक कार्य इतने लगातार और विस्तृत होते हैं कि वे सामान्य कार्यभार के साथ उसका संतुलन नहीं बना पा रहे हैं। इसके चलते उनका पढ़ाने और शोध कार्य बाधित हो रहा है, जो शैक्षणिक क्षेत्र के लिए चिंता का विषय बन गया है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि चुनाव आयोग के निर्देशानुसार विश्वविद्यालय शिक्षक और अन्य कर्मचारी चुनावी प्रक्रिया के संचालन में मदद करते हैं, लेकिन इसके लिए अचानक लंबी ड्यूटी लगाना और लगातार जिलों में घूमना उनके लिए चुनौतीपूर्ण होता है। कुछ शिक्षक मानसिक थकावट और फिजिकल तनाव के कारण अनौपचारिक छुट्टियां लेने को मजबूर हो रहे हैं।
कुशल प्रशासन और विश्वविद्यालय के शीर्ष अधिकारियों से इन शिक्षकों ने निवेदन किया है कि चुनावी तैनाती को इस तरह से व्यवस्थित किया जाए कि वे अपनी शैक्षणिक जिम्मेदारियों को भी सहजता से निभा सकें। साथ ही, चुनाव आयोग से भी आग्रह किया गया है कि शिक्षक वर्ग को विशेष मान्यता और राहत प्रदान की जाए ताकि उनका स्वास्थ्य और शैक्षणिक कार्य दोनों खराब न हों।
विश्वविद्यालय के शिक्षक संगठन भी इस मुद्दे पर सक्रिय हैं और उच्च अधिकारियों के समक्ष अपनी चिंताएं दर्ज करा रहे हैं। उनका कहना है कि शिक्षा और लोकतंत्र दोनों महत्वपूर्ण हैं, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोगों को इस तरह से टंका देना उनकी उत्पादकता और समर्पण को प्रभावित कर सकता है।
यह स्थिति दर्शाती है कि चुनाव प्रक्रिया में लगे सभी पक्षों को संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। शिक्षकों की मदद से चुनाव सुचारू रूप से हो, परन्तु उनकी भावनात्मक और शारीरिक सीमा का सम्मान भी जरूरी है। भविष्य में बेहतर कार्य वितरण और समझौते से इस तनाव को कम किया जा सकता है, जिससे दोनों क्षेत्रों—शिक्षा और चुनाव—का समुचित विकास सुनिश्चित हो सकेगा।

