क्या गोवा में पुर्तगाली भाषा के प्रति प्रेम असली है या केवल दिखावा

Rashtrabaan

    गोवा में पुर्तगाली भाषा को लेकर एक नई पुस्तक ने यह सवाल उठाया है कि क्या उस भाषा के प्रति लोगों का प्रेम सचमुच दिल से है या यह केवल एक दिखावा है। गोवा जोकि कभी पुर्तगाली उपनिवेश था, वहां पुर्तगाली भाषा और संस्कृति का प्रभाव आज भी महसूस किया जाता है। लेकिन क्या इस भाषा के साथ जुड़ाव वास्तव में गहरा है या यह सिर्फ सामाजिक प्रतिष्ठा का एक प्रतीक मात्र है, इस पर विचार करना जरूरी है।

    अधिकांश लोग जब सुनते हैं कि कोई गोवा से है, तो वे उम्मीद करते हैं कि वह पुर्तगाली भाषा में दक्ष होगा। पर कई ऐसे भी हैं जो इसे पूरी तरह से बोलने या समझने में असमर्थ हैं, या फिर भाषा के प्रति उनका लगाव सतही है। पुर्तगाली भाषा का प्रेम गोवा की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, लेकिन क्या यह प्रेम वास्तविक और स्थायी है, इसका जवाब पुस्तक में खोजा गया है।

    पुस्तक में बताया गया है कि पुर्तगाली भाषा का ज्ञान और उसका प्रयोग उन परिवारों में अधिक है जिनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पुर्तगाली शासन या संस्कृति से जुड़ाव रहा है। वहीं कई युवा पीढ़ी इस भाषा को भूलते जा रहे हैं या इसे केवल एक सांस्कृतिक पहचान के रूप में ही देखते हैं। अंग्रेज़ी और मराठी के प्रति बढ़ती प्राथमिकता ने भी इस पर प्रभाव डाला है। पुस्तक में ऐसे उदाहरण भी दिए गए हैं जहां लोग केवल सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए या अपनी विरासत का प्रदर्शन करने के लिए पुर्तगाली भाषा में बातचीत दिखावा करते हैं।

    पुस्तक के लेखक ने इस विषय पर गहराई से शोध किया है और कई लोगों के साथ बातचीत की है, जिसमें यह सामने आया है कि पुर्तगाली भाषा में निपुणता और प्रेम के बीच एक विभेद मौजूद है। भाषा का प्रेम तभी स्थायी और असरदार होता है जब वह रोजमर्रा की जिंदगी में सक्रिय रूप से उपयोग की जाए और उसे भावनात्मक तौर पर भी अपनाया जाए। प्रदर्शन के लिए भाषा का उपयोग अस्थायी और सतही होता है।

    गोवा की सांस्कृतिक विविधता और इतिहास को देखते हुए यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि भाषा किसी भी संस्कृति की आत्मा होती है। पुर्तगाली भाषा के संरक्षण के लिए सिर्फ प्रेम की बात करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसे संरक्षित और सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्धता और निरंतर प्रयास भी जरूरी हैं। यह पुस्तक गोवा के सामाजिक और भाषाई परिवेश को समझने में मददगार साबित होगी और पाठकों को सोचने पर मजबूर करेगी कि भाषा के प्रति उनका अपना नजरिया क्या है।

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