चीन ने वर्षों से अपने विशाल व्यापार अधिशेष और घरेलू मांग की कमी को लेकर वैश्विक आलोचनाओं का सामना किया है। विश्वव्यापी बाजारों में उसकी पकड़ मजबूत होने के बावजूद, चीन पर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि उसका आर्थिक मॉडल असंतुलित है और यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अनुचित लाभ उठा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन का बड़ा व्यापार अधिशेष मुख्यतः उसकी निर्यात आधारित नीतियों का परिणाम है, जिसने घरेलू खपत को प्रोत्साहित करने की दिशा में आवश्यक सुधारों को पीछे छोड़ दिया है। सरकार तो लगातार घरेलू मांग बढ़ाने के लिए विभिन्न योजनाएं घोषित करती रही है, लेकिन उनके प्रभावी क्रियान्वयन में अभी भी चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
इस संदर्भ में, चीन ने हाल ही में G7 देशों के सामने अपनी आर्थिक नीतियों का बचाव किया और मुक्त व्यापार के महत्व को रेखांकित किया। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन के कॉल पर हुई बातचीत के दौरान चीन ने यह स्पष्ट किया कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में उसकी भूमिका संतुलित और पारदर्शी है।
विश्लेषकों का कहना है कि चीन के इस रुख से वैश्विक व्यापार में उसके प्रति बढ़ते संदेह को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। उसने यह भी कहा कि वह अपने घरेलू बाजार को मजबूती देने के लिए निरंतर प्रयासरत है और विदेशी निवेशकों के लिए खुलापन बनाए रखने को प्राथमिकता देता है।
G7 और अन्य प्रमुख आर्थिक समूह अब चीन के इस बचाव और उसके घरेलू सुधारों पर करीब से नजर रख रहे हैं। यह देखना होगा कि आने वाले वर्षों में चीन की आर्थिक नीतियों में कितनी पारदर्शिता आती है और वह अपनी घरेलू मांग को प्रोत्साहित करने में कितनी सफलता हासिल करता है। वैश्विक आर्थिक सहयोग के लिए यह आवश्यक है कि सभी देशों के बीच संतुलन बना रहे और व्यापारिक नीति में पारस्परिक विश्वास विकसित हो।

