सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा है कि उन्हें केवल कमाई करने वालों पर निर्भर नहीं माना जाना चाहिए। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि सच यह है कि घर के सही संचालन में गृहिणियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यह बयान घरेलू कार्यों के मूल्यांकन और गृहिणियों के प्रति समाज के दृष्टिकोण को बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
न्यायालय ने कहा कि यह विडंबना है कि गृहिणियों को आर्थिक रूप से निर्भर माना जाता है, जबकि असल में घर के सभी काम-काज में उनकी भूमिका निर्णायक होती है। परिवार के सदस्यों की देखभाल, घर के प्रबंधन और सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह गृहिणी की वजह से संभव होता है। ऐसे में उनके किए गए कार्यों की उचित मान्यता और उनका आर्थिक मूल्यांकन होना आवश्यक है।
विशेष रूप से कोर्ट ने यह प्रस्ताव रखा कि अगर गृहिणी के बिना घर संचालन प्रभावित होता है तो उसकी देखभाल के नुकसान का मूल्यांकन करना चाहिए। इसमें आर्थिक हानि की बात करते हुए कहा गया कि पत्नी की घरेलू देखभाल का मूल्य कम से कम ₹30,000 प्रतिमाह माना जाना चाहिए। इस कदम से घरेलू कार्यों का महत्व और भी स्पष्ट होगा और महिलाओं के कार्यों को पारिश्रमिक देने की दिशा में समाज जागरूक होगा।
वर्तमान समय में जब महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता को बढ़ावा दिया जा रहा है, तब अदालत का यह रुख घरेलू कामकाज को भी आर्थिक आधार पर आंकने की ओर बड़ा कदम माना जा रहा है। इससे महिलाओं के घर के बाहर के कार्यों की तरह घरेलू कार्यों को भी मान्यता प्राप्त होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर घरेलू कार्यों को आर्थिक दृष्टि से मान्यता दी जाती है, तो इससे महिलाओं को घर के बाहर करियर बनाने में भी रणनीतिक समर्थन मिलेगा। इससे घरेलू कामकाज करना किसी सामाजिक तौर पर कमतर कार्य नहीं रहेगा और समाज में महिलाओं की भूमिका की महत्वपूर्ण पुनःस्थापना होगी।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय घरेलू महिलाओं के स्थान और महत्व को नई दिशा देने वाला है। यह न केवल कानूनी दृष्टि से सही है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी महिलाओं के काम का उचित मूल्यांकन करने का मार्ग प्रशस्त करता है।

