मिथिला कला के संरक्षण और संवर्धन के लिए काम करने वाली संस्था MAATI (मिथिला आर्ट आर्टिसन ट्रांसफॉर्मेटिव इनिशिएटिव) ने बिहार की महिलाओं को एक नई पहचान दी है। विशेष रूप से मधुबनी और दरभंगा क्षेत्र की चार महिला कलाकारों ने कर्नाटक के बेंगलुरु में अपनी कला का प्रदर्शन करके इस बात को साबित किया है कि स्थानीय कला सीमाओं से परे जाकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चमक सकती है।
MAATI का उद्देश्य न केवल मिथिला कला के पारंपरिक रूपों को बढ़ावा देना है बल्कि इन महिला शिल्पकारों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना और उनकी कलात्मक प्रतिभा को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाना भी है। पिछले कुछ वर्षों में इस संगठन ने महिला कारीगरों के लिए प्रशिक्षण कार्यशालाओं और प्रदर्शनियों का आयोजन किया है, जिससे उनकी कला को नए आयाम मिल सके।
बेंगलुरु प्रदर्शनी में यह चार कलाकार अपनी विभिन्न कलाकृतियों जैसे वस्त्रों पर चित्रकारी, दीवार कला एवं अन्य हस्तशिल्प वस्तुएं लेकर आईं, जो दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय रहीं। यह आयोजन न केवल मिथिला कला की पहचान मजबूत करता है बल्कि बिहार की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का भी एक बड़ा कदम साबित हुआ है।
महिला कलाकारों ने बताया कि इस पहल ने उनकी सोच को विस्तारित किया है। अब वे केवल पारंपरिक कला तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नई तकनीकों और डिजाइनों के माध्यम से अपने काम को और भी उन्नत कर रही हैं। उनका मानना है कि MAATI जैसे प्लेटफॉर्म से वे अपने हुनर को देश-विदेश तक पहुंचा सकती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए ऐसे संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब वे अपनी कला के माध्यम से स्वतंत्र होती हैं, तो उनका सामाजिक स्थिति और आत्म-सम्मान दोनों में सुधार होता है। इस प्रदर्शन से स्पष्ट हुआ कि मिथिला कला केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के विकास का माध्यम भी बन रही है।
आगे भी MAATI ऐसी ही पहलों को जारी रखने का संकल्प लेकर चल रहा है, ताकि बिहार की महिला कलाकारों की कला देश-विदेश में अपनी अलग पहचान बना सके। इस प्रकार की पहल स्थानीय कला के संरक्षण के साथ-साथ दलित, अनुभवी और युवा कलाकारों को भी प्रोत्साहित करने में मदद करती है।
इस प्रदर्शन ने दर्शकों को मिथिला कला की गहराई और विविधता का अनुभव कराया है, और साथ ही यह संदेश दिया है कि बिहार की महिलाएं अपनी कला से न केवल अपनी आजीविका चला रही हैं, बल्कि वे सामाजिक बदलाव की भी प्रतिनिधि हैं।

