नई दिल्ली। महाराष्ट्र सरकार ने हाल ही में ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा को अनिवार्य करने का जो निर्णय लिया है, उसने राजनीतिक और सामाजिक सरोकारों को सुलगाने का काम किया है। इस फैसले पर उत्तर प्रदेश और बिहार के राजनीतिक दलों ने तीखी टिप्पणियां की हैं, जिससे यह मामला न केवल क्षेत्रीय राजनीति बल्कि भाषा और रोजगार से जुड़ी संवेदनाओं का भी गहरा मुद्दा बन गया है। महाराष्ट्र परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने 1 मई से लागू करने की घोषणा की थी कि सभी ऑटो-टैक्सी चालकों को मराठी बोलना, पढ़ना और लिखना आना जरूरी होगा। इसके बाद से यह मामला विवादों में घिर गया।
यूपी-बिहार के भाजपा सहयोगी दल इस फैसले पर असंतोष जता रहे हैं और इसे गैर-मराठी प्रवासियों के अधिकारों पर हमला मान रहे हैं। भाजपा के गुरु प्रकाश पासवान ने कहा है कि क्षेत्रीय पहचान महत्वपूर्ण है, फिर भी देश के हर नागरिक को समान अवसर मिलना चाहिए। वहीं, बिहार की जेडीयू ने कहा कि जो गैर-मराठी प्रवासी इतने समय से महाराष्ट्र में रह रहे हैं, उन्हें भाषा सीखने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। निषाद पार्टी के नेता संजय निषाद ने इसे सामाजिक सौहार्द्र बिगाड़ने वाला कदम बताया और सरकार से कहा कि प्रतिबंध के स्थान पर प्रशिक्षण मुहैया कराए।
विपक्ष ने किया कड़ी चिंता जताने का काम
राजद के प्रवक्ता मनोज झा ने इसे गलत तानाशाही आदेश करार दिया और कहा कि भाषाओं के बीच विवाद नहीं, बल्कि राजनैतिक षड्यंत्रों के कारण लड़ाई होती है। समाजवादी पार्टी के नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय ने विशेष रूप से चिंता जताई कि हजारों प्रवासी मजदूरों का रोजी-रोटी का प्रश्न दांव पर लग सकता है। कांग्रेस ने इस निर्णय को संघीय ढांचे और मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताते हुए इसे संवैधानिक सवाल माना है।
नया नियम और उसकी सीमाएं
पहले शासनादेश में यह भी कहा गया था कि जो चालकों को मराठी नहीं आती, उनके लाइसेंस रद्द किए जा सकते हैं, लेकिन बड़े विरोध के बाद सरकार ने इसे संशोधित करते हुए 100 दिनों की मोहलत और काम में जरूरी मराठी तक सीमित करने का फैसला किया। सरकार का कहना है कि यह लोगों की सहूलियत के लिए है, ताकि स्थानीय यात्रियों को बेहतर सेवा मिले।
किसी भी प्रांत में निवास करने वाले अन्य राज्यों के लोग वहाँ के रोजगार में भागीदारी करते हैं। विशेषकर मुंबई और महाराष्ट्र के अन्य शहरों में यूपी-बिहार से आए प्रवासी मजदूर काफी संख्या में ऑटो-टैक्सी चलाते हैं, इसलिए भाषा का अनिवार्य होना उनके आजीविका से सीधे संबंधित है।
मराठी भाषा और भूमिपुत्र का पुराना विवाद
महाराष्ट्र में वर्षों से भूमिपुत्र तथा मराठी भाषा का मुद्दा राजनीतिक तनाव की जड़ रहा है। शिवसेना और मनसे जैसी पार्टियां अक्सर इस पहचान को चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल करती रही हैं। प्रताप सरनाईक का यह कदम इसी विचारधारा की झलक माना जा रहा है।
वहीं कानूनी दृष्टि से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत सभी नागरिकों को देश के किसी भी भाग में व्यापार या पेशा करने का अधिकार प्राप्त है। इस आधार पर विशेषज्ञ कहते हैं कि भाषा आधारित काम करने पर रोक लगाना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है।
इस पूरे विवाद में इस बात की भी उम्मीद जताई जा रही है कि सरकार और संबंधित पक्ष संवाद के माध्यम से समाधान निकाले ताकि सामाजिक सौहार्द्र बना रहे और प्रवासी श्रमिकों के हित का भी ध्यान रखा जा सके।

