पश्चिम बंगाल चुनाव चरण II: तृणमूल के गढ़ में बीजेपी के वरिष्ठ और सीपीआई(एम) के युवा मोर्चे ने दिखाया दम

Rashtrabaan

    पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण में राजनीति का तापमान चरम पर है। तृणमूल कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले इलाकों में इस बार भाजपा के वरिष्ठ नेता जैसे सुवेंदु अधिकारी, स्वपन दासगुप्ता, अर्जुन सिंह, तपस रॉय और वाम मोर्चा के युवा चेहरे कलटन दासगुप्ता, मीनाक्षी मुखर्जी, दीप्सिता धर ने चुनावी मैदान में दमखम दिखाया है। यह मुकाबला राज्य की राजनीतिक दिशा को तय करने वाला माना जा रहा है।

    भाजपा के अनुभवी नेताओं की रणनीति स्पष्ट रूप से तृणमूल के मजबूत इंटीग्रिटी और जनसमर्थन को चुनौती देने की है। सुवेंदु अधिकारी, जो पहले तृणमूल के ही नेता थे, ने पार्टी छोड़ कर भाजपा का दामन थामा और अब अपनी गहरी पकड़ वाले क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे हैं। स्वपन दासगुप्ता और अर्जुन सिंह जैसे विचारधारा के धुरंधर राजनीतिक लड़ाई में भाजपा का पक्ष मजबूत करते नजर आ रहे हैं।

    वहीं वाम मोर्चा के युवा और नई ऊर्जा से भरपूर चेहरे जैसे कलटन दासगुप्टा, मीनाक्षी मुखर्जी और दीप्सिता धर भी अपनी-अपनी चुनावी क्षेत्रों में जनता से समर्थन हासिल करने के लिए मेहनत कर रहे हैं। इनका तफसील से विस्तार किया गया राजनीतिक अनुभव और जनसेवा का दृष्टिकोण तृणमूल को चुनौती देने में अहम भूमिका निभा रहा है।

    यह चुनाव भाजपा और वाम मोर्चा के लिए केवल सत्ता चुनौती नहीं बल्कि अपने-अपने राजनीतिक अस्तित्व को साबित करने की भी कसौटी है। चुनावी प्रचार-प्रसार में दोनों पार्टियों के नेता न सिर्फ त्रिमूर्ति कांग्रेस के उम्मीदवारों को टक्कर दे रहे हैं, बल्कि अपने समर्थकों को भी जोश से भर देने का काम कर रहे हैं। उनमें से हर एक उम्मीदवार अपने क्षेत्र की समस्याओं को जनता के सामने लाने और विकास के मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार दिख रहा है।

    तृणमूल कांग्रेस, जो लंबे समय से राज्य की सरकार चला रही है, इस बार भी अपने पुराने समर्थकों को मजबूत बनाए रखने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है। हालांकि भाजपा के अनुभवी नेताओं और वाम मोर्चा के युवा उम्मीदवारों की बढ़ती ताकत से मुकाबला आसान नहीं होगा।

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस चुनाव में जनभावनाओं और क्षेत्रीय मुद्दों को समुचित रूप से उठाने वाले पार्टी को ही बढ़त मिलने की संभावना है। ऐसे में पुराने अनुभव और नए जोश का मेल यह तय करेगा कि पश्चिम बंगाल की राजनीति का रुख अगले पांच वर्षों के लिए किस दिशा में जाएगा।

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