मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण, CM मोहन यादव की सर्वदलीय बैठक में कराया संकल्प

Rahul Maurya

मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए मुख्यमंत्री मोहन यादव ने गुरुवार को अपने निवास पर सर्वदलीय बैठक बुलाई, जिसमें सभी दलों ने एकमत होकर संकल्प पारित किया। बैठक में BJP, कांग्रेस, AAP, SP, BSP, CPI, और गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के नेताओं ने हिस्सा लिया। CM यादव ने कहा कि सरकार और विपक्ष सुप्रीम कोर्ट में एकजुट होकर 27% आरक्षण के लिए लड़ेगा, ताकि कोई भी पात्र उम्मीदवार नौकरी से वंचित न रहे। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई 23 सितंबर से रोजाना होगी, और सभी पक्षों के वकील 10 सितंबर से पहले संयुक्त रणनीति बनाएँगे।

आरक्षण का इतिहास और कानूनी अड़चनें

मध्य प्रदेश में 2019 में कमलनाथ सरकार ने ओबीसी आरक्षण को 14% से बढ़ाकर 27% किया, जिससे कुल आरक्षण 63% हो गया। यह सुप्रीम कोर्ट के 1992 के इंद्रा साहनी फैसले में निर्धारित 50% की सीमा से अधिक था। इसके खिलाफ हाई कोर्ट में याचिकाएँ दायर हुईं, और 2020 में जबलपुर हाई कोर्ट ने 27% आरक्षण पर रोक लगा दी। 2022 में शिवम गौतम बनाम मप्र शासन मामले में हाई कोर्ट ने रोस्टर नोटिफिकेशन पर स्टे जारी किया, जिससे भर्ती प्रक्रियाएँ रुकीं। सरकार ने 87:13 फॉर्मूला अपनाया, जिसमें 13% पद (27% से अतिरिक्त हिस्सा) को होल्ड रखा गया। जनवरी 2025 में हाई कोर्ट ने कुछ याचिकाएँ खारिज कीं, लेकिन लगभग 70 याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।

सर्वदलीय बैठक और संकल्प

बैठक में CM यादव ने कहा, “BJP, कांग्रेस, और सभी दल 27% ओबीसी आरक्षण के लिए एकमत हैं। हम सुप्रीम कोर्ट में एकजुट होकर तर्क देंगे।” बैठक में शामिल प्रमुख नेता थे: BJP प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, मंत्री प्रहलाद पटेल, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार, AAP की रानी अग्रवाल, और SP के मनोज यादव। संकल्प में कहा गया कि ओबीसी आयोग के सर्वे के अनुसार, प्रदेश में 52% ओबीसी आबादी को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। कांग्रेस ने दावा किया कि उनकी 2019 की नीति सही थी, लेकिन BJP सरकार ने इसे लागू करने में देरी की।

कानूनी रणनीति और चुनौतियाँ

सुप्रीम कोर्ट में 23 सितंबर से रोजाना सुनवाई होगी। सरकार ने MPPSC द्वारा गलती से दायर एक जवाबी हलफनामे को वापस लिया, जिसे कांग्रेस ने अपनी जीत बताया। CM ने वकीलों से एकजुट तर्क तैयार करने को कहा ताकि आरक्षण की संवैधानिक वैधता साबित हो। चुनौती यह है कि 50% आरक्षण सीमा को तोड़ने के लिए ठोस तर्क और डेटा चाहिए।

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