जनता की गाढ़ी कमाई से ‘नेताओं’ की ब्रांडिंग

कहते है नगर पालिका प्रशासन के पास जो फंड होता है वह आम जनता की गाढ़ी कमाई से मिलने वाला टेक्स होता है। लेकिन सिवनी नगर पालिका द्वारा जनता की गाढ़ी कमाई से 'नेताओं' की ब्रांडिंग की जा रही है। जब सवाल हुए तो सीएमओ ने झाड़ा पल्ला, अध्यक्ष के पास सवालों का जवाब नहीं। अब सवाल यह है की क्या सरकारी खजाने पर डकैती डालकर चमक रहे हैं सियासी चेहरे? पढ़िए राष्ट्रबाण की विशेष खबर...

Rashtrabaan

    सिवनी, राष्ट्रबाण। आदि गुरु शंकराचार्य के अवतरण दिवस पर आयोजित ‘नगर गौरव दिवस’ भक्ति और गौरव का संगम होना था, लेकिन सिवनी नगर पालिका की मेहरबानी से यह आयोजन पूरी तरह सियासी रंग में रंग गया। मठ मंदिर में आयोजित इस सरकारी कार्यक्रम ने भक्ति कम और भाजपा के प्रचार तंत्र की झलक ज्यादा दिखाई। आलम यह रहा कि नगर पालिका के आधिकारिक फ्लेक्स और होर्डिंग्स से निर्वाचित पार्षदों और जिम्मेदार अधिकारियों की तस्वीरें नदारद रहीं, जबकि ‘कथित’ भाजपा नेताओं और ठेकेदारों के चेहरों ने पूरे शहर को पाट दिया। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या नगर पालिका प्रशासन जनता से वसूले गए टैक्स के पैसों को पार्टी विशेष के प्रचार में पानी की तरह बहा रहा है?

    सरकारी फ्लेक्स से लोकतंत्र के प्रतिनिधि गायब

    नियमों के मुताबिक, यदि कोई कार्यक्रम नगर पालिका परिषद द्वारा आयोजित किया जाता है, तो उसमें क्षेत्र के सांसद, विधायक, नगर पालिका अध्यक्ष, सीएमओ और निर्वाचित पार्षदों की तस्वीरें होना अनिवार्य है। लेकिन सिवनी में तो गंगा ही उल्टी बहती दिखी। नगर गौरव दिवस के नाम पर लगे फ्लेक्स में पार्षदों के सम्मान को ताक पर रख दिया गया। पार्षदों की जगह उन चेहरों को प्रमुखता दी गई, जिनका नगर पालिका के प्रशासनिक ढांचे से कोई सीधा वास्ता नहीं है। जानकार इसे लोकतंत्र का अपमान और प्रशासनिक प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ाना बता रहे हैं।

    सवाल सुनते ही अध्यक्ष की ‘गिघ्घी’ बंधी, सीएमओ के बयान ने खोली पोल

    इस पूरे मामले पर जब ‘राष्ट्रबाण’ ने नगर पालिका अध्यक्ष ज्ञानचंद सनोडिया से सीधा सवाल किया कि “क्या ये फ्लेक्स नगर पालिका के बजट से छपे हैं?”, तो उनके पास कोई ठोस जवाब नहीं था। जो अध्यक्ष मंचों पर दहाड़ते हैं, वे इस सवाल पर बगले झांकते नजर आए और “बाद में बात करते हैं” कहकर कन्नी काट ली। दूसरी ओर, नगर पालिका सीएमओ विशाल सिंह मर्स्कोले के बयान ने इस मामले में घी डालने का काम किया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “नगर पालिका प्रशासन ने ऐसे कोई फ्लेक्स नहीं लगवाए हैं।” सीएमओ का कहना है कि अगर फ्लेक्स लगे हैं, तो वे अध्यक्ष ज्ञानचंद सनोडिया ने निजी तौर पर लगवाए होंगे और इसका भुगतान सरकारी खजाने से नहीं किया जाएगा।

    यक्ष प्रश्न: अगर निजी खर्च है, तो ‘नगर पालिका परिषद’ का नाम क्यों?

    सीएमओ के बयान के बाद मामला और पेचीदा हो गया है। शहर में चर्चा है कि यदि ये होर्डिंग्स अध्यक्ष ने अपने निजी खर्च पर लगवाए हैं, तो उन पर “नगर पालिका परिषद सिवनी, मध्यप्रदेश” क्यों लिखा गया है? क्या निजी प्रचार के लिए सरकारी संस्था के नाम का इस्तेमाल करना कानूनी रूप से सही है? या फिर यह एक सोची-समझी रणनीति है कि नाम सरकारी संस्था का हो और चेहरा नेताओं का चमकता रहे, ताकि बाद में बिलों का भुगतान पिछले दरवाजे से किया जा सके?

    बुखार उधार न देने वाले अध्यक्ष क्या खुद करेंगे भुगतान?

    सिवनी के राजनीतिक गलियारों में ज्ञानचंद सनोडिया की छवि एक ऐसे नेता की है जो बेहद नपे-तुले खर्च के लिए जाने जाते हैं। स्थानीय लोगों का तो यहां तक कहना है कि “वे अपना बुखार भी उधार न दें”, तो फिर लाखों रुपये के फ्लेक्स वे अपनी जेब से क्यों लगवाएंगे? जनता के बीच यह बात गले नहीं उतर रही है कि निजी प्रचार के लिए अध्यक्ष अपनी तिजोरी खोलेंगे। संदेह की सुई सीधे तौर पर सरकारी बजट के दुरुपयोग की ओर इशारा कर रही है।

    कथित ठेकेदारों और नेताओं का ‘कब्जा’

    हैरानी की बात यह भी है कि इन विज्ञापनों में कुछ ऐसे लोगों की तस्वीरें भी चस्पा हैं, जिन्हें जनता ‘कथित ठेकेदार’ के रूप में जानती है। क्या अब नगर पालिका के गौरव दिवस का पैमाना जनप्रतिनिधियों से हटकर ठेकेदारी और चमचागिरी तक सीमित रह गया है? पार्षदों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि जनता द्वारा चुने जाने के बावजूद उन्हें एक सरकारी कार्यक्रम के विज्ञापनों में जगह देना भी मुनासिब नहीं समझा गया।

    जनता की कमाई पर सियासी डाका?

    सिवनी की जनता सड़क, नाली और मूलभूत सुविधाओं के लिए टैक्स भरती है। लेकिन जब वही टैक्स के पैसे नेताओं की व्यक्तिगत ब्रांडिंग और पार्टी के प्रचार में खर्च होने लगें, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजमी है। नगर गौरव दिवस के इस आयोजन ने यह साफ कर दिया है कि सत्ता के रसूख के आगे नियम-कायदे और प्रोटोकॉल बौने साबित हो रहे हैं। अब देखना यह होगा कि क्या इस वित्तीय अनियमितता और प्रोटोकॉल के उल्लंघन पर जिला प्रशासन कोई संज्ञान लेता है, या फिर ‘नगर पालिका परिषद’ के नाम के पीछे छिपे इन निजी विज्ञापनों का भुगतान भी चुपचाप जनता की जेब से ही कर दिया जाएगा।

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