सिवनी, राष्ट्रबाण। मध्यप्रदेश सरकार एक ओर शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए ‘उत्कृष्ट विद्यालय’ जैसे संस्थान चला रही है, वहीं दूसरी ओर सिवनी जिले में इन विद्यालयों को अपनी जागीर समझने वाले जिम्मेदार अधिकारी नियमों की धज्जियां उड़ाने में मसरूफ हैं। जिले के प्रतिष्ठित उत्कृष्ट विद्यालय में प्राचार्य महेश कुमार गौतम ने नियमों को ताक पर रखकर एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है, जिसने शिक्षा विभाग की शुचिता पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामला शैक्षणिक सत्र 2023-24 से जुड़ा है। नियमों के मुताबिक, किसी भी छात्र या छात्रा को कक्षा 12वीं में सीधे प्रवेश देने का प्रावधान नहीं है, विशेषकर तब जब वह दूसरे विद्यालय से आया हो। लेकिन उत्कृष्ट विद्यालय के प्राचार्य महेश कुमार गौतम ने तमाम कायदों को दरकिनार करते हुए मिशन माध्यमिक विद्यालय में कक्षा 11वीं में पढ़ने वाली एक छात्रा इशिका पिता नरेंद्र को सीधे कक्षा 12वीं में दाखिला दे दिया।
हैरानी की बात यह है कि जब जागरूक नागरिकों ने इस मामले की तहकीकात की और दूसरे जिले के उत्कृष्ट विद्यालयों से नियमावली मांगी, तो वहां से स्पष्ट जवाब मिला कि सीधे 12वीं में प्रवेश देना पूरी तरह नियम विरुद्ध है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर प्राचार्य गौतम के पास ऐसी कौन सी ‘विशेषाधिकार’ की शक्ति थी, जिससे उन्होंने नियमों को ठेंगा दिखा दिया?
डीईओ की मेहरबानी, शिकायतें खा रही हैं धूल
इस गंभीर अनियमितता की शिकायत जिला शिक्षा अधिकारी शिवराज सिंह कुमरे से सप्रमाण की गई है। लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी स्थिति “ढाक के तीन पात” जैसी बनी हुई है। आरोप है कि डीईओ कुमरे ने प्राचार्य महेश कुमार गौतम को मौन ‘अभयदान’ दे रखा है। शिकायतों पर कार्रवाई करने के बजाय उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। विभाग की यह सुस्ती साफ इशारा करती है कि कहीं न कहीं ऊपर से नीचे तक सांठगांठ का जाल बिछा हुआ है।
सीएम हेल्पलाइन पर भी ‘गोलमोल’ जवाब, सिस्टम लाचार
जब जिले के अधिकारियों ने आंखें मूंद ली, तो शिकायतकर्ताओं ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन का दरवाजा खटखटाया। लेकिन यहाँ भी शिक्षा विभाग के जादूगरों ने अपना खेल दिखा दिया। जाँच और कार्रवाई के नाम पर विभाग ने सीएम हेल्पलाइन पर गुमराह करने वाले और गोलमोल जवाब भेजकर शिकायत को बंद कराने का प्रयास किया। जनता की उम्मीदों के केंद्र ‘सीएम हेल्पलाइन’ को भी इस मामले में ठगा जा रहा है।
मनमानी का नतीजा, गिरता शैक्षणिक स्तर
प्राचार्य की इस प्रशासनिक मनमानी और नियमों के उल्लंघन का असर विद्यालय के शैक्षणिक वातावरण पर भी पड़ रहा है। जानकारों का कहना है कि जब मुखिया ही नियमों को तोड़कर ‘बैकडोर एंट्री’ कराने लगे, तो अनुशासन की उम्मीद किससे की जाए? इस वर्ष के परीक्षा परिणामों में भी प्राचार्य की इस कार्यप्रणाली का बुरा प्रभाव देखने को मिला है। नतीजा यह रहा की लगातार स्कूल का परिणाम गिर रहा है और प्राचार्य अपना जादूगरी दिखा रहे है।
कब तक चलेगा रसूख का खेल?
शिकायतकर्ता महेंद्र शाह मर्स्कोले और हर्ष नंदनवार, अब यह पूछ रहे हैं कि क्या उत्कृष्ट विद्यालय जैसे संस्थान अब रसूखदारों और रसूख रखने वाले प्राचार्य की निजी संपत्ति बन गए हैं? क्या नियम केवल आम छात्रों के लिए हैं? प्राचार्य को बचाने के पीछे जिला शिक्षा अधिकारी की क्या मजबूरी है? अगर समय रहते इस ‘एडमिशन घोटाले’ की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जाँच नहीं हुई, तो शिक्षा विभाग की साख पूरी तरह जमींदोज हो जाएगी। फिलहाल, यह मामला पूरे नगर में चर्चा का विषय बना हुआ है और विभागीय चुप्पी कई राज खोल रही है।
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