पूरब भारत की प्राचीन ब्रह्मपुत्र नदी का अन्वेषण

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    पूरब भारत की असम और अरुणाचल प्रदेश से बहती ब्रह्मपुत्र नदी, जो मनासरovar झील व कैलाश पर्वत से प्रारंभ होकर लगभग 1900 मील लंबा मार्ग तय करती है, धार्मिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। विश्व के नौवें सबसे बड़े नदी तंत्र के रूप में यह तिब्बत से होते हुए भारत और फिर बांग्लादेश से बंगाल की खाड़ी में मिलती है।

    हाल ही में, दो स्वतंत्र पत्रकारों, एलन कून और थॉमस केली ने भारत के उस भाग का दौरा किया जो ब्रह्मपुत्र के किनारे बसे विभिन्न समुदायों का बसेरा है। उनकी रिपोर्ट में सामने आया कि इस नदी में स्थानीय लोग दिव्यता और सम्मान के साथ देखते हैं। कई जनजातियों और धार्मिक समूहों ने ब्रह्मपुत्र को एक जीवित देवता माना है जो जीवन देने के साथ-साथ विनाशकारी रूप भी धारण करता है।

    2025 की जनवरी में, ये पत्रकार अरुणाचल प्रदेश के उत्तर में नदी के प्रवेश बिंदु से लेकर असम के गुवाहाटी तक यात्रा कर भारतीय हिस्से की व्यापक तस्वीर पेश करते हैं। ब्रह्मपुत्र तिब्बत में ‘सांगपो’, अरुणाचल प्रदेश में ‘सियांग’ और असम में यह नदियों लोहीत, डिबंग और सियांग के सामंजस्य से ब्रह्मपुत्र के नाम से जानी जाती है।

    इस यात्रा के दौरान, नदी के किनारे बसे लोगों की सांस्कृतिक विविधता, विभिन्न धार्मिक विश्वासों के साथ-साथ प्राकृतिक पर्यावरण की समृद्धि का विस्तृत चित्र उभरता है। अरुणाचल प्रदेश के जंगली नदियों और हरे-भरे जंगलों से लेकर असम के मैदानी इलाकों तक, ब्रह्मपुत्र अपने प्रवाह में जीवन की शक्ति समेटे हुए है।

    स्थानीय निवासी दावा करते हैं कि भले ही आज नदी के आसपास जलविद्युत परियोजनाओं और बढ़ती प्रदूषण की चुनौतियां हैं, फिर भी ब्रह्मपुत्र का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व अटूट बना हुआ है। विभिन्न जनजातीय समुदायों, हिंदू, बौद्ध, इस्लाम और ईसाई धर्मावलंबियों के बीच यह नदी एकात्मता का सूत्रधार है।

    माजुली द्वीप, जो ब्रह्मपुत्र के मध्य में स्थित है और दुनिया का सबसे बड़ा तटबंधी नदी द्वीप है, यहां की सांस्कृतिक विरासत का केंद्र है। यहां की सामुदायिक पूजा पद्धति, नृत्य, धार्मिक नाट्य और हस्तशिल्प ब्रह्मपुत्र की उपजाऊ मिट्टी और बहती पानी से गहरे जुड़े हैं।

    आईन कून और थॉमस केली की रिपोर्ट दर्शाती है कि ब्रह्मपुत्र केवल जल स्रोत नहीं बल्कि एक जीवंत, संवेदी, दिव्य सत्ता है जिसके बिना क्षेत्र की जीवनरेखा अधूरी है। नदी की उत्पत्ति, इसके विभिन्न नाम, और इसके पात्र सांप्रदायिक सह-अस्तित्व की कहानी कहते हैं।

    हालांकि तकनीकी विकास और बांध परियोजनाएं आर्थिक दृष्टि से आवश्यक हैं, स्थानीय लोग चिंता जताते हैं कि इसका पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासत पर विपरीत प्रभाव हो सकता है। ब्रह्मपुत्र की विविधता और क्षमता के संरक्षण पर जोर देते हुए पत्रकारों ने एक मजबूत संदेश दिया है कि इस महान नदी का सम्मान और संरक्षण हर नागरिक की जिम्मेदारी है।

    इस रिपोर्ट के माध्यम से भारतीय पूर्वोत्तर के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक परिप्रेक्ष्य में ब्रह्मपुत्र नदी की प्रस्तुति की गई है जो जल, जीवन और धार्मिक भावनाओं से जुड़ी संवेदनाओं को उजागर करती है।

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