अमेरिका की सरकार ने मेक्सिको स्थित ड्रगकार्टेल से जुड़े वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा होने के आरोप में दो भारतीयों और उनकी कंपनियों के खिलाफ प्रतिबंध लगाए हैं। यह कार्रवाई अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय ने 23 अप्रैल को की गई सूची में प्रकाशित की गई है, जिसमें कुल 23 व्यक्ति और संस्थाएं शामिल हैं।
प्रतिबंधित व्यक्तियों में सतीशकुमार हरेश्वरभाई सुतारिया और युक्ताकुमारी आशीषकुमार मोदी शामिल हैं। इनके माध्यम से संचालित कंपनी एसआर केमिकल्स और अग्रत केमिकल्स पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने मेक्सिको और ग्वाटेमाला को प्रारंभिक रसायनों की बिक्री और शिपमेंट में मदद की, जिनके रसायनों को गलत तरीके से सुरक्षित रसायन बताकर लेबल किया गया। ये प्रारंभिक रसायन अवैध फेंटानिल के उत्पादन में उपयोग किए जा रहे थे, जो एक खतरनाक नशीला पदार्थ है।
गुजरात एंटी-टेररिस्ट स्क्वाड ने मार्च 2025 में सुतारिया और मोदी को इस संदर्भ में गिरफ्तार किया था। बाद में फरवरी में गुजरात हाईकोर्ट से दोनों ने जमानत प्राप्त की। उनके खिलाफ नारकोटिक ड्रग्स और सायकोट्रॉपिक सब्सटेंस एक्ट के अंतर्गत मामला दर्ज किया गया है। 15 मई को उनके खिलाफ आरोपपत्र दायर किया गया और फिलहाल वे न्यायिक प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं।
अमेरिकी दूतावास, भारत ने एक बयान में कहा कि भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियां इस आपराधिक नेटवर्क को तोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के इस हिस्से को निशाना बनाया गया जो अवैध ड्रग कारोबार को बढ़ावा दे रहा था।
यह कार्रवाई अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय मादक पदार्थ नियंत्रण नीतियों के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है और यह संकेत देती है कि भारत में भी अवैध ड्रग सप्लाई चैनलों पर कड़ी नजर रखी जा रही है। इस मुद्दे के बढ़ते जोखिम और गंभीरता को देखते हुए स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग बढ़ाया जा रहा है ताकि ड्रग तस्करी को प्रभावी ढंग से रोका जा सके।
सुतारिया और मोदी के खिलाफ कार्रवाई से यह स्पष्ट होता है कि न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर भी नशीले पदार्थों के खिलाफ चुप्पी तोड़ी जा रही है और अपराधियों के खिलाफ ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। भारतीय न्याय व्यवस्था में उनके मामले की सुनवाई जारी है और आगे की कार्रवाई पर पूरी नजर रखी जा रही है।
इस मामले ने ड्रग तस्करी और उसके वैश्विक नेटवर्क की गंभीरता को एक बार फिर सामने रखा है, जिसके परिणामस्वरूप देशों के बीच सहयोग और सूचना आदान-प्रदान को और मजबूत करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

