फोटो में: मुंबई में 45,000 मैंग्रोव पेड़ कटने से कोली मछुआरों को अपनी आजीविका और सांस्कृतिक पहचान खतरे में

Rashtrabaan

    मुंबई के तटवर्ती क्षेत्र में लगभग 45,000 मैंग्रोव पेड़ों की कटाई ने कोली मछुआरों की आजीविका और सांस्कृतिक पहचान को गहरा संकट में डाल दिया है। कोली समुदाय, जो पीढ़ियों से इस क्षेत्र की तटीय जलधाराओं में मछली पकड़ने का काम कर रहा है, इस बदलाव को लेकर गहरी चिंता में है।

    सुबह के शुरुआती समय में जब कोली मछुआरे अपनी छोटी नावों पर सवार होकर जलधाराओं में निकलते हैं, तो उनके लिए यह काम केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक विरासत का भी हिस्सा है। उनकी मछली पकड़ने की परंपरा सदियों पुरानी है, जो तटीय मैंग्रोव जंगलों पर निर्भर है।

    मैंग्रोव के जंगल न केवल इस क्षेत्र के पर्यावरण को स्थिर बनाते हैं, बल्कि समुद्र की लहरों को भी नियंत्रित करते हैं, जिससे बाढ़ का खतरा कम होता है। ये जंगल कार्बन को अवशोषित करते हैं और मछलियों के लिए एक सुरक्षित आवास प्रदान करते हैं, जिससे स्थानीय मछुआरे अपनी मछली पकड़ने की गतिविधि को सुचारू रूप से चला पाते हैं।

    लेकिन अभी मुंबई में वर्सोवा और भायंदर के बीच 26 किलोमीटर लंबे तटीय रास्ते के निर्माण की योजना के कारण इन मैंग्रोव जंगलों को साफ करना शुरू कर दिया गया है। इस रास्ते के बनने से कोली मछुआरे अपनी पारंपरिक जगहों से विस्थापित हो सकते हैं और उनकी आय में भारी गिरावट आ सकती है।

    चर्कोप क्षेत्र के मछुआरे संजय भंडारी का कहना है, “मैं दिन में लगभग 1,500 से 2,000 रुपये कमाता हूं और हम साल भर मछली पकड़ते हैं। अगर यह तटीय रास्ता बन गया, तो मेरी आय शून्य हो जाएगी।”

    इस मामले में मुंबई उच्च न्यायालय ने पहले ही इस सड़क निर्माण को अनुमति दे दी है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने मार्च में इस आदेश को रद्द करने से इनकार कर दिया है। मुंबई की महानगर पालिका इस परियोजना को आगे बढ़ा रही है, जिसे पूरा होने में काफी समय लग सकता है।

    इस कदम से कोली मछुआरों की आजीविका खत्म होने का खतरा उठ खड़ा हुआ है, साथ ही उनकी सांस्कृतिक पहचान भी खतरे में पड़ गई है। पर्यावरणविद् और स्थानीय समुदाय दोनों इस परियोजना के खिलाफ विरोध कर रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज पर्याप्त प्रभावी साबित नहीं हो पा रही है।

    यह परियोजना न केवल पारिस्थितिकीय असंतुलन पैदा करेगी, बल्कि मुंबई के तटीय क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों पर भी बुरा प्रभाव डालेगी, जिससे स्थानीय समुदाय की जीविका पर गहरा असर पड़ेगा। ऐसे में आवश्यक है कि सरकार और संबंधित एजेंसियां इस मुद्दे को संवेदनशीलता से देखें और स्थायी विकास के हित में कदम उठाएं।

    कोली मछुआरों के लिए यह सिर्फ रोजगार का प्रश्न नहीं बल्कि उनकी सांस्कृतिक विरासत और जीवन शैली का भी मुद्दा है, जिसे संरक्षण की सख्त आवश्यकता है।

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