फिल्म ‘दृढ़म’ की शुरुआत काफी उम्मीदों के साथ हुई थी, लेकिन अंत में यह उन उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी। पुलिस प्रोसिजुरल थ्रिलर के रूप में यह फिल्म अपनी पहचान बनाने की कोशिश करती है, मगर क्लिच्ड कहानी और अत्यधिक हिंसा के कारण यह प्रभावित होने में असफल रहती है।
शेन निगम की मुख्य भूमिका वाली यह फिल्म एक ऐसे पुलिस अधिकारी की कहानी बताती है, जो एक रहस्यमय मामले की जांच में लगा होता है। हालांकि, शुरुआती दृश्यों में कहानी में थ्रिल और रहस्य का अच्छा फ्लेवर नजर आता है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, क्लिच का चक्र बढ़ता जाता है। फिल्म में दिखाए गए कई सीन टूटे-फूटे डायगराम की तरह लगते हैं, जो दर्शकों की दिलचस्पी कम कर देते हैं।
सबसे बड़ी कमी फिल्म की पटकथा में है। कहानी के कई पहलू इतने पारंपरिक और सामान्य हैं कि वे किसी भी नए या अनोखे ट्विस्ट से भरपूर नहीं लगते। यह एक आम पुलिस केस थ्रिलर तक सीमित रह जाती है, जो दर्शकों को वह रोमांच या गहराई नहीं दे पाती जिसकी genre से अपेक्षा की जाती है।
फिल्म में अत्यधिक हिंसा भी एक महत्वपूर्ण नकारात्मक पहलू है। हिंसा को नाटकीयता बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया गया है, लेकिन यह कभी-कभी कहानी को भटकाने और भावनात्मक जुड़ाव को कमजोर करने का काम कर जाती है। दर्शक इस वजह से कहानी के साथ जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते और थकान महसूस करते हैं।
हालांकि, शेन निगम का प्रदर्शन ठोस और भरोसेमंद है, जो फिल्म की कुछ कमियों को छिपाने की कोशिश करता है। उनके अभिनय में वह वास्तविकता और जज़्बा है, जो इस फिल्म के लिए एक जोरदार पहलू रहा। साथ ही, तकनीकी विभाग जैसे सिनेमैटोग्राफी और बैकग्राउंड स्कोर ने कुछ प्रभाव छोड़ने का काम किया।
कुल मिलाकर, ‘दृढ़म’ एक ऐसी फिल्म है जो पुलिस थ्रिलर की तरह शुरू होती है, लेकिन अपनी कमजोर पटकथा और अतिशयोक्तिपूर्ण हिंसा के कारण अपेक्षित सस्पेंस और गहराई नहीं दिखा पाती। यदि कहानी में कुछ नवाचार और संतुलित संवाद होते, तो यह फिल्म अधिक प्रभावशाली हो सकती थी। फिलहाल, यह फिल्म उन दर्शकों के लिए एक सामान्य और अधूरी पुलिस procedural के रूप में याद रहेगी।

