‘मैं एक अभिनेता नहीं हूँ’ फिल्म समीक्षा: नवाजुद्दीन सिद्दीकी की थकावट भरी स्वतंत्र फिल्म का आकर्षण खोता Excess में

Rashtrabaan

    अदित्य क्रिपलानी द्वारा लिखित और निर्देशित ‘‘मैं एक अभिनेता नहीं हूँ’’ एक ऐसी फिल्म है जो अपनी सरलता और न्यूनतम डिजाइन के बीच भारी संवादों के कारण अपनी मौलिकता खोती नजर आती है। इस फिल्म की कहानी और पात्रों के बीच की बातचीत अक्सर इतनी जटिल और अतिशयोक्ति भरी होती है कि यह फिल्म की लय को तोड़ देती है।

    फिल्म के निर्देशक का स्वाभाविक अंदाज़, जो निश्चित रूप से उनकी कलात्मक अभिव्यक्ति का हिस्सा है, कई बार पात्रों की मानवता को पीछे धकेल देता है। संवाद इतने भारी भरकम हैं कि दर्शक कभी-कभी कहानी की जगह निर्देशक की आवाज़ सुनते हुए महसूस करते हैं। यह एक ऐसी चुनौती है जो स्वतंत्र एवं सौम्य फिल्म निर्माण के बीच संतुलन बनाए रखने में बाधित करती है।

    नवाजुद्दीन सिद्दीकी, जिन्हें उनके अभिनय कौशल के लिए जाना जाता है, इस फिल्म में एक ऐसा किरदार निभाते हैं जो उनकी प्रतिभा के अनुरूप है, लेकिन संवादों की भारी प्रकृति के कारण उनका सहज और प्राकृतिक अभिनय प्रभाव कम हो जाता है। फिल्म का उद्देश्य था मानव पात्रों को प्रामाणिक रूप में उभारना, लेकिन संवाद और पटकथा की जटिलता ने इस लक्ष्य में बाधा उत्पन्न की है।

    फिल्म की थीम, जो आम तौर पर इंडी फिल्मों में देखने को मिलती है, दर्शकों को कुछ खास संदेश देने की कोशिश करती है, किन्तु वह संदेश इस हद तक अधिभारित संवादों के बीच दब कर रह जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि फिल्म की संपूर्णता कहीं कहीं उपद्रवी और बोझिल हो जाती है।

    फिल्म की सिनेमैटोग्राफी और संगीत ने कुछ हद तक इसे सहारा दिया है, परन्तु संवाद और पटकथा की खामियां इसे एक बेहतर अनुभव बनने से रोकती हैं। यह फिल्म स्वतंत्र फिल्म प्रेमियों के लिए एक गंभीर लेकिन थकाऊ प्रयास की तरह अनुभव हो सकती है।

    अंततः ‘‘मैं एक अभिनेता नहीं हूँ’’ एक ऐसी फिल्म है जो सिनेमा की कला का सम्मान करती है, लेकिन निर्देशन के अत्यधिक ज़ोर ने इसकी स्वाभाविक ताजगी को प्रभावित किया है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी की अदाकारी हमेशा प्रशंसनीय होती है, फिर भी यह फिल्म उनकी प्रतिभा का पूरा उपयोग करने में सफल नहीं हो पाई है।

    यदि इस फिल्म से कोई सीख ली जाए तो वह यह है कि संवाद और पटकथा के बीच संतुलन बनाना अत्यंत आवश्यक है ताकि दर्शक पात्रों से जुड़ सकें और कहानी का आनंद ले सकें। अत्यधिक संवादमयता अंततः फिल्म के आकर्षण को कम कर देती है और दर्शकों को थका देती है, जैसा इस उदाहरण में देखने को मिलता है।

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