भारत के सिनेमा की विविधता में नया नाम लेकर आई है फिल्म ‘कर्तव्य’, जो एक हार्टलैंड नोइर (हृदयभूमि रहस्यमय थ्रिलर) की कहानी प्रस्तुत करती है। इस फिल्म का मुख्य विषय मानव मन की आवाज और उसकी नैतिकता के प्रति संघर्ष है, जिसे बहुत ही संवेदनशील तरीके से बुना गया है। हालाँकि, इस फिल्म की स्ट्रक्चर और कथानक में कुछ कमी देखने को मिलती है, जो इसे पूर्ण रूप से प्रभावी नहीं होने देती।
‘कर्तव्य’ की कहानी उस सचाई को उजागर करती है कि इंसान का मन हमेशा सही और गलत के बीच की लड़ाई लड़ता रहता है। यह फिल्म इस बात की पड़ताल करती है कि व्यक्ति की नैतिकता पर उसका पर्यावरण और समाज कितना प्रभाव डालते हैं। परन्तु, इस फिल्म के क्लाइमेक्स और प्लॉट में संरचनात्मक साफ़-सफाई कुछ अधिक हो गई है, जिससे कहानी की गहराई प्रभावित होती है।
फिल्म के खलनायक का किरदार काफी सपाट और बेदिल लगने लगता है, जो नाटक को कमजोर कर देता है। दर्शक इस हिस्से में कुछ जोड़-तोड़ या विविधता की आशा कर सकते थे, लेकिन बस एक ही दिशा में कहानी चली और इससे किरदारों की जीवंतता कम हो गई। स्टार कास्ट में सैफ अली खान की उपस्थिति फिल्म को मजबूती जरूर देती है, लेकिन उनके स्टारडम को फिल्म में गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है, जिससे कहानी का फोकस काफ़ी प्रभावित हुआ है।
फिल्म की सिनेमेटोग्राफी और संगीत भी ठीक-ठाक स्तर पर हैं, लेकिन ये पहलू कहानी को वह जरूरी समर्थन नहीं दे पाते जिसका दर्शक मुआवजा चाहते हैं। ‘कर्तव्य’ एक ऐसा प्रयास है जो दर्शाता है कि कैसे इंसान की अंतरात्मा उसके निर्णयों और जीवन के रास्तों को प्रभावित करती है, परन्तु यह प्रयास कथन के स्तर पर पूरी तरह सफल नहीं हो पाता।
सारांश में कहा जा सकता है कि ‘कर्तव्य’ एक दिलचस्प विषय लेकर आई है, लेकिन कहानी के कथ्य और प्रस्तुति में सुधार की जरूरत है। फिल्म को देखने वाले दर्शकों को सैफ अली खान का प्रदर्शन जरूर पसंद आएगा, लेकिन उन्हें कहानी की कमजोरियों को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसके बावजूद, यह फिल्म सामाजिक और नैतिक सवालों को उठाती है जो हमारे जीवन का हिस्सा हैं, और इसीलिए इसकी प्रशंसा की जानी चाहिए।

