वित्तीय और कर विशेषज्ञों का मानना है कि फ्लिपकार्ट की एकीकृत लॉजिस्टिक्स सेवाएँ वस्तु परिवहन एजेंसी (जीटीए) सेवाओं के दायरे में नहीं आती हैं। इस परिप्रेक्ष्य में, फ्लिपकार्ट ने हाल ही में कोलकाता उच्च न्यायालय में डिलीवरी शुल्क पर जीएसटी छूट की मांग को लेकर एक याचिका दायर की है।
पिछले अपीलीय आदेश के बाद, जहां फ्लिपकार्ट को अपनी लॉजिस्टिक्स सेवाओं को जीटीए के रूप में मान्यता नहीं मिली, कंपनी ने इस निर्णय के खिलाफ उच्च न्यायालय का रूख किया है। फ्लिपकार्ट का तर्क है कि उसकी लॉजिस्टिक्स सेवाएँ एकीकृत व्यापार मॉडल का हिस्सा हैं, जो पारंपरिक वस्तु परिवहन एजेंसी की सेवाओं से अलग हैं, इसलिए उन्हें डिलीवरी शुल्क पर जीएसटी लगाने से छूट मिलनी चाहिए।
कर विशेषज्ञों के अनुसार, वस्तु परिवहन एजेंसी (जीटीए) सेवाओं और फ्लिपकार्ट की लॉजिस्टिक्स सेवाओं के बीच स्पष्ट कानूनी अंतर है। जीटीए सेवाओं के तहत केवल सामान का परिवहन किया जाता है, जबकि फ्लिपकार्ट का एकीकृत मॉडल इसमें अन्य सेवाएं भी शामिल करता है जैसे कि पैकेजिंग, डिलीवरी की देखरेख, और कस्टमर सपोर्ट। इस वजह से फ्लिपकार्ट का दावा है कि डिलीवरी शुल्क पर जीएसटी लागू करना अनुचित होगा क्योंकि यह सीधे तौर पर उनके लॉजिस्टिक्स ऑपरेशंस से जुड़े नहीं हैं।
विभिन्न कानूनी एवं कर विश्लेषकों ने यह भी बताया कि अगर फ्लिपकार्ट को इस मामले में न्यायालय से राहत मिलती है, तो इससे न केवल कंपनी बल्कि पूरी ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स इंडस्ट्री को काफी फायदा होगा। जीएसटी छूट मिलने से डिलीवरी शुल्क कम हो सकता है, जो अंततः ग्राहकों के लिए उत्पादों की कुल लागत में कमी लाएगा।
फिलहाल, कोलकाता उच्च न्यायालय इस मामले की सुनवाई कर रहा है और विशेषज्ञों की नजरें इस निर्णय पर टिकी हैं, क्योंकि यह ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न साबित हो सकता है। न्यायालय के निर्णय से भारतीय ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स सेक्टर की जीएसटी से संबंधित पद्धतियों में बदलाव आना संभव है।
इस पूरे मामले में यह स्पष्ट है कि फ्लिपकार्ट ने डिलीवरी शुल्क पर जीएसटी छूट पाने के लिए न्यायिक रास्ता अपनाया है, जो कंपनी के वित्तीय ढांचे और उपभोक्ता लागत में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। आने वाले दिनों में न्यायालय के फैसले से इस विवाद का अंत होगा, जो ई-कॉमर्स सेक्टर के लिए मार्गदर्शक साबित होगा।

