दुनिया के दो सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों, चीन और भारत ने साफ-सफाई और हरित ऊर्जा क्षेत्र में बड़े दांव लगाए हैं, जबकि पश्चिमी देश इस दशक की शुरुआत में अपनी महत्वाकांक्षी ग्रीन हाइड्रोजन योजनाओं से धीरे-धीरे पीछे हट रहे हैं। यह बदलाव मुख्य रूप से लागत से जुड़ी चुनौतियों के कारण सामने आया है, जो पूर्वानुमान से कहीं अधिक टिकाऊ और भारी साबित हुई हैं।
ग्रीन हाइड्रोजन, जो नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से उत्पादित होता है, को क्लीन एनर्जी क्रांति की अगली कड़ी माना जा रहा है। पश्चिमी देशों ने शुरुआती वर्षों में इस क्षेत्र में बड़े लक्ष्य निर्धारित किए थे लेकिन आर्थिक दिक्कतों और तकनीकी अड़चनों के चलते अब उन्होंने अपेक्षित गति से पीछे हटना शुरू कर दिया है।
वहीं दूसरी ओर, चीन और भारत ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए रणनीतिक निवेश और योजना के तहत अपनी ग्रीन हाइड्रोजन और अन्य क्लीन एनर्जी परियोजनाओं को गति दी है। दोनों देशों ने पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर अपनी निर्भरता कम करने के साथ-साथ ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन में वैश्विक अग्रणी बनने के प्रयास तेज कर दिए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और भारत के ये कदम न केवल उनके ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेंगे, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार को भी नया आकार देंगे। भारत ने हाल ही में कई नीतिगत बदलाव किए हैं, जिसमें क्लीन हाइड्रोजन के उत्पादन व इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रोत्साहन शामिल हैं। चीन, जो पहले से ही दुनिया में नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में सबसे आगे है, ने ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में भी भारी निवेश किया है।
इस समय जब पश्चिमी देश आर्थिक स्तरों पर पीछे हट रहे हैं, तब इन दो एशियाई महाशक्तियों की यह रणनीति भले ही विभिन्न चुनौतियों से घिरी हो, लेकिन उनकी सतत और वैज्ञानिक योजनाएं भविष्य में ऊर्जा क्षेत्र में उनकी स्थिति मजबूत कर सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव न केवल जलवायु परिवर्तन के खिलाफ विश्व के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, बल्कि ऊर्जा के व्यापार और तकनीकी प्रगति के क्षेत्र में भी नया युग लेकर आएगा।
अत: चीन और भारत की यह रणनीतिक सट्टेबाजी विश्व के ऊर्जा परिदृश्य में एक बड़ा मोड़ साबित हो सकती है, जो आने वाले दशकों में वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक समीकरणों को प्रभावित करेगी।

