बिहार विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती शुरू होने के साथ ही इंडिया गठबंधन में सियासी हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस पार्टी पर अपने सहयोगी दलों का भारी दबाव है कि वह संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का बहिष्कार करे, जो अडानी समूह से जुड़े मुद्दों की जांच के लिए गठित की गई है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD), जो बिहार में कांग्रेस की सबसे बड़ी सहयोगी है, भी इस बहिष्कार की योजना बना रहा है। यह कदम कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है, क्योंकि उसका रुख RJD और अन्य सहयोगियों जैसे समाजवादी पार्टी (SP), तृणमूल कांग्रेस (TMC), और शिवसेना (UBT) से अलग है। बिहार में पहले से ही चुनावी रणनीति को लेकर तनाव बढ़ रहा है, और JPC का मुद्दा गठबंधन की एकजुटता को और परख सकता है।
JPC बहिष्कार का सियासी मकसद
JPC बहिष्कार का विचार उस समय जोर पकड़ रहा है, जब बिहार में विधानसभा चुनाव अक्टूबर-नवंबर 2025 में होने वाले हैं। RJD और अन्य सहयोगी दलों का मानना है कि JPC में शामिल होने से विपक्ष का ध्यान बंट सकता है, और यह केंद्र सरकार के खिलाफ उनके आक्रामक रुख को कमजोर कर सकता है। RJD के एक वरिष्ठ नेता ने हाल ही में कहा कि JPC का गठन एक तरह से सरकार की रणनीति है, जिससे विपक्ष को व्यस्त रखा जाए और बिहार जैसे महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दों से ध्यान हटाया जाए। दूसरी ओर, कांग्रेस इस मुद्दे पर असमंजस में है। पार्टी के कुछ नेता मानते हैं कि JPC में हिस्सा लेकर वे सरकार पर दबाव बना सकते हैं, लेकिन सहयोगियों का बढ़ता दबाव उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर रहा है।
बिहार में बढ़ता सियासी तापमान
बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले इंडिया गठबंधन के सामने कई चुनौतियां हैं। हाल ही में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) को लेकर विवाद ने गठबंधन को एकजुट किया है, लेकिन JPC का मुद्दा इसे फिर से बांट सकता है। RJD नेता तेजस्वी यादव ने पहले ही SIR के खिलाफ चुनाव बहिष्कार की संभावना जताई थी, जिसे कांग्रेस ने भी समर्थन दिया था। हालांकि, JPC के मुद्दे पर RJD का रुख कांग्रेस के स्टैंड से उलट है, जिससे गठबंधन में तनाव की स्थिति बन रही है। विश्लेषकों का कहना है कि अगर कांग्रेस JPC बहिष्कार में शामिल नहीं होती, तो RJD और अन्य सहयोगी दलों के साथ उसका रिश्ता कमजोर पड़ सकता है, जो बिहार में चुनावी रणनीति को प्रभावित करेगा।
कांग्रेस की रणनीतिक उलझन
कांग्रेस के लिए यह स्थिति दोहरे दबाव की तरह है। एक तरफ, वह बिहार में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती है, जहां वह RJD के साथ मिलकर NDA को चुनौती दे रही है। दूसरी तरफ, JPC जैसे राष्ट्रीय मुद्दों पर उसे विपक्ष की एकजुटता दिखाने की जरूरत है। हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने SIR के खिलाफ जोरदार अभियान चलाया है, जिससे बिहार में उनकी सक्रियता बढ़ी है। लेकिन JPC बहिष्कार पर सहयोगियों का दबाव कांग्रेस को एक कठिन फैसले की ओर धकेल रहा है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अगर कांग्रेस JPC में हिस्सा लेती है, तो यह गठबंधन के भीतर अविश्वास को जन्म दे सकता है।
बिहार चुनाव पर असर
बिहार में इंडिया गठबंधन पहले ही सीट बंटवारे और नेतृत्व जैसे मुद्दों पर तनाव का सामना कर रहा है। 2020 के विधानसभा चुनाव में RJD ने 71 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस को सिर्फ 19 सीटें मिली थीं, जिसके बाद RJD ने कांग्रेस की क्षमता पर सवाल उठाए थे। इस बार, कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में दलित और पिछड़े वर्गों को लुभाने की कोशिश कर रही है, लेकिन JPC विवाद गठबंधन की एकता को कमजोर कर सकता है। अगर सहयोगी दल JPC बहिष्कार पर एकजुट हो जाते हैं और कांग्रेस इसका हिस्सा नहीं बनती, तो बिहार में गठबंधन की रणनीति पर सवाल उठ सकते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति NDA को फायदा पहुंचा सकती है, जो नीतीश कुमार और BJP के नेतृत्व में पहले से ही मजबूत स्थिति में है।
Read also: मोबाइल झाड़ी में फेंका, दीवार कूदी… ED रेड में फरार होने की कोशिश में TMC विधायक गिरफ्तार