सिवनी, राष्ट्रबाण। शिव की नगरी कहे जाने वाले सिवनी जिला मुख्यालय की सड़कें अब सुरक्षित नहीं रह गई हैं। शहर में आवारा कुत्तों का आतंक इस कदर बढ़ गया है कि अब लोग अपने ही घरों से निकलने में थर-थर कांप रहे हैं। कल दिन भर में ही नगर को दहला कर रख दिया है। एक ही दिन में 30 मासूमों, महिलाओं और बुजुर्गों को कुत्तों ने अपना निवाला बनाने की कोशिश की।
अस्पताल में चीख-पुकार, सड़कों पर दहशत
जिला चिकित्सालय का नजारा 19 जनवरी 2026 को किसी युद्ध क्षेत्र जैसा नजर आया, जहां घायल एक-एक कर मरहम-पट्टी और एंटी-रेबीज इंजेक्शन के लिए पहुंच रहे थे। किसी के पैर का मांस नोच लिया गया, तो कोई बच्चा अपने चेहरे पर गहरे जख्म लेकर पहुंचा। गलियों में सन्नाटा पसरा है और जो बाहर निकल भी रहे हैं, वे हाथों में डंडा लेकर चलने को मजबूर हैं।
प्रशासन की कुंभकर्णी नींद कब खुलेगी?
जनता की सुरक्षा का दम भरने वाली नगर पालिका आखिर किस गुफा में सो रही है? सवाल तीखे हैं लेकिन आज जरूरी हैं: नसबंदी के नाम पर सरकारी बजट का क्या हुआ? कागजों पर चलने वाला नसबंदी अभियान जमीन पर दम क्यों तोड़ रहा है? रेबीज नियंत्रण की क्या स्थिति है? जब शहर की सड़कों पर यमदूत घूम रहे हैं, तब प्रशासन निगरानी का दावा कैसे कर सकता है?
वही जिम्मेदारों की चुप्पी
क्या प्रशासन को किसी बड़ी अनहोनी या मासूम की जान जाने का इंतजार है? आज सिवनी की जनता खुद को लावारिस महसूस कर रही है। प्रशासन की सुस्ती ने आवारा कुत्तों के हौसले बुलंद कर दिए हैं। वही शहरवासियों का गुस्सा अब फूटने लगा है। सोशल मीडिया से लेकर मोहल्लों की चौपालों तक, सिर्फ एक ही मांग है त्वरित कार्रवाई होना चाहिए। यदि नगर पालिका ने तत्काल कुत्तों को पकड़ने और नसबंदी का ठोस अभियान नहीं छेड़ा, तो जनता का यह डर जल्द ही आक्रोश के बड़े आंदोलन में बदल सकता है। वही आम जनता से अपील है कि जब तक प्रशासन जागता है, तब तक अपने बच्चों और बुजुर्गों को अकेले बाहर न भेजें।
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