बरेली। मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले के कुछ महत्वपूर्ण बयानों को सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से देख कर अपना समर्थन जताया है। उन्होंने ज्ञानवापी मेहराब विवाद और मथुरा की ईदगाह मस्जिद को लेकर एक स्पष्ट और संजीदा रुख अपनाया है, जो धार्मिक सहिष्णुता और न्याय के आधार पर आधारित है।
मौलाना रजवी ने कहा कि दत्तात्रेय होसबाले का अमेरिका के वाशिंगटन डीसी में यह कहना कि “हिंदुओं ने कभी किसी पर हमला नहीं किया,” एक सही ऐतिहासिक तथ्य है। उन्होंने विस्तार से बताया कि भारत के इतिहास में हिंदू समाज ने कभी आक्रामक युद्ध नहीं किए और यह बात हमारे सनातन धर्म के मूल तत्वों में भी निहित है। मौलाना ने इस्लाम के इतिहास का भी उल्लेख करते हुए कहा कि इस धर्म का टकराव मुख्य रूप से यहूदियों और ईसाइयों से रहा है, न कि भारतीय धर्मों जैसे हिंदू, जैन, बौद्ध, या सिखों से। इसका उदाहरण आज के वैश्विक संघर्ष जैसे अमेरिका-इजरायल और ईरान विवादों में भी देखा जा सकता है।
उन्होंने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के ‘भारत को विश्व गुरु बनाने’ की बात का समर्थन करते हुए बताया कि जब भारत प्रगति करेगा, तो देश के सभी समुदायों की भलाई और विकास संभव होगा। भारत के विकास से सभी धर्मों और जातियों के लोगों को समान लाभ मिलेगा।
बाबरी मस्जिद-राम मंदिर मामले में मौलाना रजवी ने कहा कि मुसलमानों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सम्मान दिया और उसे स्वीकारा, साथ ही राम मंदिर के निर्माण को कानूनी रूप से मान्यता दी। मगर, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अन्य मस्जिदों, जैसे वाराणसी की ज्ञानवापी और मथुरा की ईदगाह मस्जिद को लेकर कोई भी समझौता स्वीकार्य नहीं होगा। यह उनके धार्मिक अधिकार का मामला है, जिसे लेकर कोई समझौता नहीं होना चाहिए।
धीरेंद्र शास्त्री के विवादित बयानों पर प्रतिक्रिया देते हुए मौलाना ने कहा कि उनकी बातें अक्सर समाज में तनाव और विभाजन को बढ़ावा देती हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों की संख्या पर किसी को रोक लगाने का अधिकार नहीं है क्योंकि यह हर परिवार का व्यक्तिगत निर्णय होता है।
इसके अतिरिक्त, बेंगलुरु में सीईटी के दौरान छात्रों के साथ कथित भेदभाव के मामले को लेकर उन्होंने संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की बात कही। जनेऊ को लेकर होने वाला भेदभाव और अन्य धार्मिक प्रतीकों के कारण छात्रों को परेशान करना निंदनीय है। उन्होंने मांग की कि राज्य सरकार इस मुद्दे पर निर्णायक कदम उठाए और किसी भी धर्म के छात्रों के भविष्य के साथ अन्याय न हो।
मौलाना शहाबुद्दीन रजवी का यह स्पष्ट रुख धार्मिक सद्भाव और न्याय की नींव को मजबूत करता है। उनकी बातों से यह स्पष्ट होता है कि वे सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान और संवेदनशीलता की मांग करते हैं और देश के विकास में सभी समुदायों की भागीदारी और सह-अस्तित्व को महत्व देते हैं।

