पीएम मोदी की डिग्री रहेगी गोपनीय, दिल्ली हाई कोर्ट ने रद्द किया CIC का आदेश

Rahul Maurya

नई दिल्ली, राष्ट्रबाण: दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) को पीएम मोदी की स्नातक डिग्री से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस सचिन दत्ता की बेंच ने दिल्ली यूनिवर्सिटी की याचिका पर यह फैसला सुनाया, जिसमें यूनिवर्सिटी ने तर्क दिया था कि छात्रों की शैक्षणिक जानकारी निजी होती है और इसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। इस फैसले ने निजता के अधिकार को सूचना के अधिकार से ऊपर रखते हुए एक नई मिसाल कायम की है। यह मामला 2016 से चर्चा में था, जब एक RTI कार्यकर्ता ने 1978 के बैच की डिग्री रिकॉर्ड्स की मांग की थी, जिसमें पीएम मोदी ने भी अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की थी।

CIC के आदेश का पृष्ठभूमि

यह विवाद 2016 में शुरू हुआ, जब RTI कार्यकर्ता नीरज ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से 1978 के बैचलर ऑफ आर्ट्स (BA) के सभी छात्रों के रिकॉर्ड्स मांगे थे, जिसमें उनके रोल नंबर, नाम, पिता का नाम और अंक शामिल थे। यह वही साल था, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से अपनी स्नातक डिग्री हासिल की थी। CIC ने 21 दिसंबर 2016 को आदेश दिया था कि यूनिवर्सिटी को इन रिकॉर्ड्स की जांच की अनुमति देनी चाहिए और प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध करानी चाहिए। DU ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी, और जनवरी 2017 में कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी। नौ साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, हाई कोर्ट ने अब यूनिवर्सिटी के पक्ष में फैसला सुनाया।

निजता बनाम सूचना का अधिकार

दिल्ली यूनिवर्सिटी ने अपनी याचिका में तर्क दिया कि छात्रों की शैक्षणिक जानकारी एक गोपनीय और निजी मामला है, जिसे RTI कानून के तहत बिना ठोस सार्वजनिक हित के उजागर नहीं किया जा सकता। यूनिवर्सिटी का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि किसी व्यक्ति की डिग्री की जानकारी को महज जिज्ञासा के आधार पर सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यूनिवर्सिटी के पास 1978 की डिग्री मौजूद है, और इसे कोर्ट में पेश करने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इसे “अजनबियों” के लिए खुला करना उचित नहीं है। दूसरी ओर, RTI कार्यकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने तर्क दिया कि विश्वविद्यालय अक्सर डिग्री से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करते हैं, और यह मामला सार्वजनिक हित से जुड़ा है।

कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

जस्टिस सचिन दत्ता ने 27 फरवरी 2025 को फैसला सुरक्षित रखा था और 25 अगस्त को इसे सुनाया। कोर्ट ने कहा कि निजता का अधिकार, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मूल अधिकार है, RTI के तहत सूचना के अधिकार से प्राथमिकता रखता है। इस फैसले ने न केवल दिल्ली यूनिवर्सिटी को राहत दी, बल्कि देशभर की यूनिवर्सिटियों के लिए एक नजीर स्थापित की। कोर्ट ने यह भी माना कि CIC का आदेश व्यापक प्रभाव डाल सकता था, क्योंकि यह सभी छात्रों की निजी जानकारी को उजागर करने का रास्ता खोल देता। इससे पहले, गुजरात हाई कोर्ट ने भी 2023 में एक समान मामले में CIC के आदेश को रद्द किया था, जिसमें पीएम मोदी की पोस्टग्रेजुएट डिग्री की जानकारी मांगी गई थी।

सियासी चर्चा

यह मामला लंबे समय से सियासी बहस का केंद्र रहा है। विपक्षी दलों, खासकर आम आदमी पार्टी (AAP) ने पीएम मोदी की शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठाए थे। AAP नेता और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 2016 में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था, जिसके बाद यह कानूनी जंग शुरू हुई थी। बीजेपी ने इसे विपक्ष की सियासी साजिश करार दिया और कहा कि यह फैसला निजता के अधिकार की जीत है। विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है, क्योंकि RTI कार्यकर्ता इस फैसले को चुनौती दे सकते हैं। फिलहाल, यह फैसला निजता और गोपनीयता के सवालों को और गहरा कर रहा है।

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