वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि पानी के नीचे फाइबर-ऑप्टिक केबल खतरनाक ऑर्कास को बचाने में मदद करेंगे

Rashtrabaan

    सालिश सी के खतरनाक ऑर्कास यानी किलर व्हेल की निगरानी के लिए वैज्ञानिक अब समुद्र तल के नीचे बिछाए गए मीलों लंबे फाइबर-ऑप्टिक केबलों को एक विशाल सुनने वाले नेटवर्क में बदल रहे हैं। इस नई टेक्नोलॉजी को ‘डिस्ट्रिब्यूटेड एकॉस्टिक सेंसिंग’ (DAS) कहते हैं, जो व्हेल की आवाज़ों को पकड़कर उनके व्यवहार और पर्यावरणीय चुनौतियों पर महत्वपूर्ण जानकारी देती है।

    समुद्री जीवन के संरक्षण में एक नवीनता के रूप में यह प्रयोग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किलर व्हेल को विभिन्न खतरे जैसे जहाज़ों की यातायात, भोजन की कमी और जलवायु परिवर्तन का सामना करना पड़ रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस डेटा के माध्यम से व्हेलों की स्थिति का बेहतर अध्ययन होगा और उनके संरक्षण के लिए प्रभावी रणनीतियां विकसित की जा सकेंगी।

    डिस्ट्रिब्यूटेड एकॉस्टिक सेंसिंग तकनीक केबल की लंबाई भर में आवाज़ों को संवेदनशीलता से रिकॉर्ड कर सकती है, जिससे महासागर में मछलियों, व्हेलों और अन्य समुद्री जीवों की गतिविधियों को वास्तविक समय में समझना संभव होगा। इससे पहले इस तरह के काम के लिए महंगे और सीमित संख्या में उपकरणों का सहारा लिया जाता था, पर अब यह तकनीक दूरसंचार नेटवर्क का उपयोग कर व्यापक और स़स्ते ढंग से जानकारी एकत्रित कर रही है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्री किलर व्हेल लगभग हर रोज़ जहाज़ों की आवाज़ों से प्रभावित होती हैं, जिससे उनका संचार बाधित होता है और उनका तनाव स्तर बढ़ता है। इससे न केवल उनकी प्रजनन क्षमता पर असर पड़ता है, बल्कि भोजन खोजने की उनकी क्षमता भी कम हो जाती है। इस निगरानी नेटवर्क की मदद से वैज्ञानिक यह समझ पाएंगे कि किस प्रकार मनुष्य के क्रियाकलाप समुद्री जीवन को प्रभावित कर रहे हैं और इन्हें कम करने के उपाय सुझा पाएंगे।

    यह परियोजना न केवल सालिश सागर के लिए बल्कि वैश्विक स्तर पर समुद्री संरक्षण प्रयासों के लिए मील का पत्थर साबित हो सकती है। जलवायु परिवर्तन की वजह से समुद्री पर्यावरण में हो रहे परिवर्तनों की निगरानी के लिए इस तकनीक की भूमिका अहम रहेगी। वैज्ञानिकों का लक्ष्य है कि भविष्य में इस तकनीक का उपयोग पूरे विश्व में समुद्र की सुरक्षा और जैव विविधता संरक्षण के लिए किया जाए।

    अंतरराष्ट्रीय समुद्री संरक्षण संगठनों और विभिन्न शोध संस्थानों के सहयोग से इस परियोजना को आगे बढ़ाया जा रहा है। उम्मीद की जाती है कि इससे न केवल किलर व्हेल जैसी प्रजातियों के संरक्षण में मदद मिलेगी, बल्कि समुद्री पारिस्थितिक तंत्र की गहरी समझ भी विकसित होगी, जो पूरी पृथ्वी के जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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