नई दिल्ली, राष्ट्रबाण: उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए एनडीए के उम्मीदवार सीपी राधाकृष्णन के नामांकन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाल किले से आरएसएस की तारीफ ने बीजेपी-आरएसएस संबंधों में बड़े बदलाव का संकेत दिया है। राधाकृष्णन, जो 16 साल की उम्र से आरएसएस स्वयंसेवक और जनसंघ के समय से कार्यकर्ता रहे हैं, को मोदी ने स्वयं प्रस्तावक बनकर उपराष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया। यह कदम पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के चयन से अलग है, जिनका आरएसएस से कोई सीधा संबंध नहीं था, और वे मोदी के भरोसेमंद होने के कारण चुने गए थे। यह बदलाव बीजेपी और आरएसएस के बीच गतिशीलता को दर्शाता है, खासकर 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी की बहुमत खोने के बाद।
बीजेपी-आरएसएस रिश्तों में बदलाव के कारण
2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को 240 सीटें मिलीं, जो बहुमत से कम थीं, और उसे गठबंधन सहयोगियों पर निर्भर रहना पड़ा। इसने आरएसएस को अपनी ताकत दिखाने का मौका दिया। मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में बीजेपी ने संगठन को केंद्रीकृत किया, जिससे कई वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ा। आरएसएस ने इस मौके पर अपनी भूमिका बढ़ाई, खासकर हरियाणा, महाराष्ट्र, और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में, जहाँ उसके स्वयंसेवकों ने मतदाता जुटाने में अहम भूमिका निभाई। दिल्ली में 48 सीटें जीतने में आरएसएस की 50,000 ‘ड्राइंग रूम’ बैठकों का योगदान रहा।
मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले से आरएसएस को “विश्व का सबसे बड़ा एनजीओ” कहकर तारीफ की, जो उनकी तीसरी पारी में आरएसएस पर बढ़ती निर्भरता को दर्शाता है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की 75 साल की उम्र में रिटायरमेंट की सलाह और सरकार की नीतियों पर टिप्पणियाँ, जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य की पहुंच से बाहर होना, ने बीजेपी पर दबाव बनाया। भागवत ने 2024 में मोदी की “कांग्रेस-मुक्त भारत” वाली टिप्पणी और अभिमान पर भी निशाना साधा था, जिसे बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व पर अप्रत्यक्ष हमला माना गया।
उपराष्ट्रपति चुनाव में रणनीति
सीपी राधाकृष्णन का चयन कई रणनीतिक कारणों से हुआ। उनकी तमिलनाडु की गौंदर जाति और AIADMK से गठबंधन को मजबूत करने की संभावना 2026 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को फायदा दे सकती है। उनकी आरएसएस पृष्ठभूमि और गैर-विवादास्पद छवि ने उन्हें विपक्ष के लिए भी स्वीकार्य बनाया। दूसरी ओर, विपक्ष ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस रेड्डी को चुना, जो राजनीतिक रूप से तटस्थ हैं। धनखड़ का इस्तीफा, जो आरएसएस से करीबी के बावजूद हुआ, बीजेपी की कठोर संदेशवाहक शैली को दर्शाता है कि वह असहमति बर्दाश्त नहीं करेगी।
बीजेपी की चुनौतियाँ
बीजेपी कई मोर्चों पर दबाव में है:
- आंतरिक असंतोष: अन्य विचारधाराओं से आए नेताओं का दबदबा और समर्पित कार्यकर्ताओं की उपेक्षा।
- आरएसएस का दबाव: भागवत और अन्य नेताओं ने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए, जैसे मणिपुर हिंसा और आर्थिक असमानता।
- विपक्ष की एकजुटता: विपक्ष का आक्रामक रवैया और एकता बीजेपी के लिए चुनौती।
- अंतरराष्ट्रीय दबाव: अमेरिका का 50% टैरिफ प्रस्ताव।
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