एशिया की CCS योजनाएं 2050 तक 25 बिलियन टन अतिरिक्त उत्सर्जन बढ़ा सकती हैं, पेरिस समझौते के लक्ष्य को खतरा: रिपोर्ट

Rashtrabaan

    नई दिल्ली। एक ताज़ा रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि एशियाई देशों में कार्बन कैप्चर और स्टोरेज (CCS) तकनीक के बढ़ते उपयोग से 2050 तक 25 बिलियन टन अतिरिक्त ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन हो सकता है। यह स्थिति पेरिस समझौते के तहत निर्धारित 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान सीमा के लक्ष्य पर गंभीर संकट ला सकती है।

    क्लाइमेट एनालिटिक्स की इस रिपोर्ट में इस तकनीक को “जोखिम भरी तकनीक” करार दिया गया है जो विकासशील और विकसित दोनों तरह की अर्थव्यवस्थाओं को महंगे जीवाश्म ईंधन पर निर्भर बनाए रखती है। रिपोर्ट के अनुसार, CCS का अतीत इसका समर्थन करने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं देता, और इस प्रक्रिया में लगी लागतें और पर्यावरणीय नुकसान ज्यादा हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि हालांकि CCS का उद्देश्य कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करना है, परंतु इसकी नापतौल और प्रभावकारिता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। CCS प्रौद्योगिकी का बाजार में उतार-चढ़ाव तथा उसके संचालन की उच्च लागत देशों को अक्षय ऊर्जा विकल्पों की ओर बढ़ने की बजाय जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल में उलझा रहे हैं।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एशियाई क्षेत्रों में कई देशों ने CCS परियोजनाओं को अपनाने की योजना बनाई है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह रणनीति वैश्विक तापमान वृद्धि को रोकने के लिए आवश्यक तेजी और स्थिरता प्रदान करने में विफल रह सकती है।

    पर्यावरणविदों और नीति निर्माताओं के बीच यह बहस जारी है कि CCS अधिक प्रभावी और टिकाऊ विकल्प प्रदान करने के बजाय एक अस्थायी उपाय के रूप में क्यों माना जाता है। इसके बजाय, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और अन्य नवीकरणीय स्रोतों की ओर तेजी से संक्रमण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

    पेरिस समझौते के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कार्बन उत्सर्जन में त्वरित और सशक्त कटौती आवश्यक है। इस दिशा में उत्सर्जन कम करने वाली तकनीकों का चयन करते समय देश और उद्योग को दीर्घकालिक प्रभाव और लागत-प्रभावशीलता का विशेष ध्यान रखना होगा।

    इस रिपोर्ट के प्रकाश में आने के बाद, सरकारों और वैश्विक पर्यावरण संस्थाओं को CCS पर निर्भरता कम कर अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए नीति निर्धारण में महत्वपूर्ण बदलाव करना होगा। यह कदम केवल पर्यावरण संरक्षण के लिए नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी आवश्यक होगा।

    अंततः, सतत विकास और कार्बन न्यूट्रल भविष्य की ओर भारत सहित पूरे एशिया को मजबूती से कदम बढ़ाने होंगे। किफायती और प्रभावी नवीकरणीय ऊर्जा विकल्पों की ही सफलता से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को नियंत्रित किया जा सकेगा और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई जीती जा सकेगी।

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