दिल्ली सरकार द्वारा 11 अप्रैल को जारी की गई ड्राफ्ट इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) नीति का उद्देश्य वाहन उद्योग में इलेक्ट्रिफिकेशन को बढ़ावा देना है। इस नीति में इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए सब्सिडी, रोड टैक्स छूट और पेट्रोल व डीजल चालित नए वाहनों के पंजीकरण पर प्रतिबंध जैसे प्रोत्साहन शामिल हैं। हालांकि, इस नीति में दो अहम सीमाएं हैं जिन पर तत्काल पुनर्विचार की आवश्यकता है।
सबसे पहला मुद्दा यह है कि नीति को प्रदूषण नियंत्रण का एकमात्र उपाय माना गया है, खासकर हवा की गुणवत्ता सुधारने के संदर्भ में। इस दृष्टिकोण से यह नीति अमीर वर्ग के कार मालिकों को भी सब्सिडी देने की वकालत करती है, जो शहर के सबसे संपन्न हिस्से हैं। यह सोच अतिशय संकीर्ण है क्योंकि ट्रांसपोर्ट के नुकसान सिर्फ वायु प्रदूषण तक सीमित नहीं हैं।
वाहनों के उपयोग से यातायात दुर्घटनाओं, शारीरिक गतिविधि में कमी, ट्रैफिक शोर और सार्वजनिक जगहों के अवैध कब्जे जैसे अन्य गंभीर सामाजिक और स्वास्थ्य मुद्दे भी उत्पन्न होते हैं। इसके अलावा, वाहन निर्माण से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होता है और बैटरी निर्माण में लिथियम, कोबाल्ट व निकल जैसे खनिजों की आवश्यकता होती है, जिनके उत्खनन से पर्यावरण और सामाजिक समस्याएं भी जुड़ी हैं।
नीति द्वारा दोपहिया, तीन पहिया, चार पहिया माल वाहनों और यात्री कारों के इलेक्ट्रिफिकेशन को मुख्यतः वायु प्रदूषण कम करने के समाधान के रूप में देखा जाना चाहिए, यह दृष्टिकोण शहरी गतिशीलता के व्यापक पुनर्विचार में बाधक है।
असल सवाल यह होना चाहिए कि केवल वायु प्रदूषण कम करने तक सीमित न रहकर शहरी परिवहन को कैसे सुरक्षित, टिकाऊ और समावेशी बनाया जाए। जो नीति बन रही है, उसमें इन व्यापक पहलुओं का समावेश नहीं है, जिससे इसके दीर्घकालिक लाभ प्रभावित हो सकते हैं।
यद्यपि नीतिगत प्रयासों का स्वागत किया जाना चाहिए, पर जरूरी है कि वे केवल प्रदूषण नियंत्रण तक सीमित न रहें, बल्कि शहरी जीवन के अन्य पहलुओं को भी ध्यान में रखें ताकि सड़कों पर वाहनों की संख्या बढ़ने पर स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक संतुलन बना रहे।
इसलिए, विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि दिल्ली सरकार को अपनी ड्राफ्ट ईवी नीति को पुनः परखना चाहिए ताकि यह नीति न केवल पर्यावरण हितैषी हो, बल्कि शहर के सभी निवासियों के लिए सुरक्षित, न्यायसंगत और टिकाऊ दृष्टिकोण प्रस्तुत कर सके।

