तमिलनाडु ने दशकों तक विधानसभा चुनाव परिणामों का इंतजार कैसे किया

Rashtrabaan

    तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण बदलाव 2001 में देखने को मिला, जब पहली बार राज्य के सभी 234 विधानसभा क्षेत्रों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) का उपयोग किया गया। यह कदम केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं था, बल्कि केरल, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में भी समान समय पर EVMs का प्रयोग शुरू हुआ। इस नवाचार ने चुनाव प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, तेज और सुरक्षित बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

    इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के उपयोग से पहले, मतदान पूरी तरह से पारंपरिक बैलेट पेपर प्रणाली पर आधारित था, जिसमें मतों की गिनती में घंटों से लेकर कभी-कभी दिनों तक लग सकते थे। बैलेट पेपर की गिनती में हुई गलतियों और वोटिंग प्रक्रिया की जटिलता को देखते हुए, EVMs को लागू करने का निर्णय चुनाव आयोग ने समयानुसार लिया।

    2001 के विधानसभा चुनाव में EVMs का पूरा उपयोग यह सुनिश्चित करता है कि मत देने की प्रक्रिया जल्दी और सुरक्षित हो सके। इन मशीनों में मत गणना तुरंत होती है जिससे परिणामों की विश्वसनीयता बढ़ती है और मतदाता के अधिकारों की रक्षा भी बेहतर ढंग से होती है। इसके साथ ही, EVM के इस्तेमाल से भ्रामक मतपत्रों और मतों की गड़बड़ी की संभावना काफी कम हो गई है।

    चुनाव आयोग के अनुसार, 2001 के चुनावों में EVM के सम्पूर्ण संचालन से मतदाताओं में इस तकनीक के प्रति विश्वास बढ़ा और मतदान दर में सुधार देखा गया। तकनीकी रूप से सक्षम होने के साथ-साथ, EVM ने चुनाव के दौरान प्रशासनिक खर्चों को भी कम करने में मदद की। यह पदचिह्न तमिलनाडु में लोकतंत्र को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हुआ।

    इस तरह, तमिलनाडु में वर्ष 2001 के विधानसभा चुनाव के दौरान EVMs का पूरे राज्य में पहली बार व्यापक उपयोग न केवल चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने में सहायक रहा, बल्कि इसने भविष्य के निर्वाचन कार्यों के लिए एक मजबूत आधार भी तैयार किया। अनेक चुनावी सुधारों के चलते आज तमिलनाडु में चुनाव संचालन और मतदाता जागरूकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो कि लोकतंत्र की गहन समझ और संवेदनशीलता को दर्शाता है।

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