श्रीलंका में गृह युद्ध खत्म होने के कई वर्षों बाद भी तामिल समुदाय गरीबी, उच्च बेरोजगारी और जमीन जबरदस्ती अधिग्रहण जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। इस संघर्ष-प्रभावित उत्तरी और पूर्वी क्षेत्रों के पुनर्निर्माण के लिए सरकारों द्वारा व्यापक योजना बनाने में स्पष्ट कमी देखी गई है। परिणामस्वरूप, इस क्षेत्र की जनता आज भी अपने मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्षरत है।
गृह युद्ध के अंत के बाद जन्मी नई पीढ़ी इस संघर्ष की गहरी जड़ और प्रभाव को पूरी तरह समझने से वंचित है, जबकि उनके माता-पिता रोज़मर्रा के भेदभाव और आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। तामिल समुदाय के लिए रोजगार के अवसर सीमित हैं और उनके सामाजिक सुरक्षा के उपाय अभी भी अधूरें हैं। भूमि विवाद आज भी एक बड़ा मसला बना हुआ है, जहां कमज़ोर तबके के लोगों की जमीन पर कब्जा जारी है।
स्थानीय विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकारी योजनाएं अक्सर अधूरी और असंगठित रह जाती हैं, जिसके चलते लोगों को अस्थायी राहत ही मिल पाती है। पुनर्वास और विकास कार्यों में पारदर्शिता की कमी का भी लोगों ने कई बार उल्लेख किया है। तामिल इलाकों के लिए नीतिगत समर्थन की जरूरत जितनी पहले थी, आज भी उतनी ही बनी हुई है।
इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं कि बिना न्याय और समावेशी विकास के समाज में स्थायी शांति स्थापित करना संभव नहीं है। गरीबी और बेरोजगारी को कम करने के लिए विशेष योजनाएं बनाना आवश्यक है, जिससे युवा वर्ग को रोजगार और शिक्षा के अवसर मिल सकें।
यद्यपि कुछ स्थानीय तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं राहत कार्यों में जुटी हैं, तथापि कई इलाकों में असमानता और विकास के अंतराल बरकरार हैं। विकास के साथ-साथ सामाजिक मेलजोल और सांस्कृतिक समझदारी को भी बढ़ावा देना होगा, ताकि स्थानीय लोग युद्ध के प्रभावों से निकलकर एक बेहतर भविष्य की ओर बढ़ सकें। इस दिशा में कदम उठाने की अति आवश्यकता है ताकि तामिल समुदाय को न्याय और समान अवसर मिल सके।

