अश्विनी इयर तिवारी की नई फिल्म ‘सिस्टम’ एक कानूनी थ्रिलर के रूप में न्याय की अवधारणा को प्रस्तुत करती है, जिसमें सोनाक्षी सिन्हा और ज्योतिका की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस फिल्म में न्याय व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं को बेहतरीन ढंग से दिखाने की कोशिश की गई है, लेकिन कुछ जगहों पर कहानी के मोड़ सामान्य और आसानी से समझ में आने वाले लगते हैं, जिससे इसकी प्रभावशीलता कम हो जाती है।
फिल्म की ताकत इसकी प्रदर्शनकारी काव्य और पात्रों की गहराई में निहित है। सोनाक्षी सिन्हा ने अपने किरदार में न्याय की गुत्थी को सुलझाने की जटिलताओं को बड़े ही संवेदनशील तरीके से दर्शाया है, जबकि ज्योतिका ने अपने मजबूत कैमियाबाजी से पूरी कहानी को मजबूती दी है। इन दोनों अभिनेत्री के प्रदर्शन ने फिल्म को एक जीवंत रूप दिया है, जो न्याय और सत्य की खोज के बीच संतुलन बनाती है।
फिल्म की पटकथा न्यायिक प्रक्रिया की पेचीदगियों और सामाजिक पटल पर उसके प्रभावों को समझने की कोशिश करती है। हालांकि, कई बार ऐसा लगने लगता है कि कहानी के मोड़ पहले से अनुमानित हैं, जिसके कारण फिल्म अपनी कसावट खो देती है। पटकथा में सुधार की गुंजाइश होने के बावजूद, फिल्म ऐसे मुद्दों पर सोचने को मजबूर करती है जो आमतौर पर सार्वजनिक चर्चा में कम आते हैं।
निर्देशक अश्विनी इयर तिवारी ने अपनी शैली में एक गंभीर और संवेदनशील विषय उठाया है, जिसमें समाज में न्याय की अहमियत और उसके लिए जारी संघर्ष को प्रमुखता दी गई है। उन्होंने फिल्म के माध्यम से यह संदेश दिया है कि प्रणाली चाहे कितनी भी जटिल हो, सत्य और न्याय के लिए लड़ाई जारी रहनी चाहिए।
कुल मिलाकर, ‘सिस्टम’ एक ऐसा प्रयास है जो न्यायिक व्यवस्था की कमज़ोरियों को सामने लाने की कोशिश करता है, जबकि इसके मुख्य कलाकार अपनी भूमिकाओं में प्रभावशाली नजर आते हैं। हालांकि कहानी के कुछ भाग थोड़े पूर्वानुमेय लगते हैं, लेकिन यह फिल्म न्याय और नैतिकता पर महत्वपूर्ण विमर्श प्रस्तुत करती है और दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है।

