बालाघाट, राष्ट्रबाण। प्राकृतिक झरनो को देखने का अहसास ही अलहदा होता है। कहीं पहाडो का सीना चिरकर ऊंची चोटियों से आता पानी, तो कहीं जंगलों के बीच किसी चोटी से नीचे बहती धार…! ऐसे खूबसूरत झरनों को देखना और उनके नीचे नहाने का सपना सजोने का अहसास भर ही, दिल के भीतर उत्साह भर देता है और रोम-रोम रोमांचित हो उठता है। बालाघाट जिला प्राकृतिक धरोहरों के लिये भी अलग पहचान रखता है। यहां कान्हा नेशनल पार्क के अलावा कई सुंदर व मन लुभावने दार्शनिक स्थल भी हैं, जिन्हे निहारने हर साल हजारों पर्यटक बालाघाट पहुंचते हैं और बालाघाट में फैली प्रकृति की सुंदर छटा का आंनद लेते हैं। चारो ओर पहाडियों से घिरा व प्रकृति की गोद में बसा हमारा बालाघाट जिला कई जल प्रपातो से अपनी नई पहचान बना चुका है।

यहां के पहाड़ी इलाकों में एक से बढकर एक जल प्रपात मौजूद है जो अपनी कल-कल जलधाराओं से ना सिर्फ लोगो को अपनी ओर बरबस ही आकर्षित करते है, बल्कि पत्थरो से टकराकर गिरने झरने जंगल भी रौनक भी बढाते है। यहां कुछ जल प्रपात ऐसे भी है जो घने जंगलों में मौजूद है और प्रकृति के नजारों को अलौकिक बनाते है। परंतु बारिश के दिनो में यही झरने ब्लैक स्पॉट के रूप में भी पहचाने जाते है। क्योकि लापरवाही के कारण कई पर्यटक असमय ही काल-कलवित हो चुके है। ऐसे में स्थानीय लोग बारिश के दिनो में अलर्ट रहते है और लोगो को झरने तक पहुंचने से रोकते है, क्योकि सावधानी में ही सुरक्षा है।
दरअसल, जिले में सुप्रसिद्ध गागुंलपारा झरनस, गढदा में अन्नपूर्णा धाम का झरना, रमरमा में महदेव पाठ, बिठली का देवकोणार, पींचीमॉल वाटरफाल तथा गोदरी का वाटरफाल लोगो को बरबस ही अपनी ओर खूब आकर्षित करते है। बारिश के शुरूआती दिनो में हजारो की संख्या में पर्यटक इन स्थलो पर पहुंचते है। यहां के प्राकृतिक सौंदर्य और सुंदर छटा का आंनद लेते हैं। लेकिन उत्साह और उमंग के बीच वे लापरवाही ही हदे भी पार कर देते है, जिसका खामयाजा उन्हे जिंदगी से हाथ धोकर चुकाना पड़ता है। पर्यटक इन स्थलो पर पहुंचने के बाद मानो बेकाबू हो जाते है और सेल्फी लेने व स्नान करने के लिये झरने के उंचे शिखर पर जाने का प्रयास करते है। जहां शरीर का नियंत्रण खोते ही उनके साथ दर्दनाक हादसा भी हो जाता है। स्थानीय लोगो की माने तो इन तमाम झरनो पर रविवार याने अवकाश के दिन खासी भीड़ देखने मिलती है। जिसके चलते यहां पहाडी के पहले नाश्ते व मक्का की दुकान लगाने वालो का व्यापार भी अच्छा होता है।
परंतु विडम्बंना की बात है कि यह है फारेस्ट रेंज में ये तमाम झरने मौजूद है। जहां पर सुरक्षा व पर्यावरण संरक्षण को लेकर विभाग के द्वारा कोई इंतजाम नही किये जाते। यदि कोई हादसा होता है तो इसको लेकर भी कोई जिम्मेंदार गंभीर नही है। शायद बालाघाट जिला प्रशासन व वन विभाग किसी विभत्स हादसे की राह देख रहा है। बारिश के दिनो में तेज बारिश होने या अचानक झरने का जलस्तर बढने से कितनी भयावह स्थिति निर्मित हो जाती है, ये किसी से पूछने की आवश्यक्ता नही है। बीते वर्ष ही गढदा की पहाडी पर धार्मिक आयोजन से लौटने के दौरान श्रद्धालुओ से साथ भयावह स्थिति बन गई थी। परंतु ऐसे तमाम घटनाचक्र से ना तो जिला प्रशासन सीख लेता और ना ही पर्यटक। आवश्यक्ता है कि ऐसे प्राकृतिक झरनो पर पूरे बारिश काल तक के लिये प्रतिबद्ध लगा देना चाहिये। अन्यथा किसी दिन कोई भयावह हादसा हो जायेगा और फिर उस हादसे की जवाबदेही लेने में मुंह छिपाने की नौबत आ पड़ेगी।