रायपुर। महानदी जल विवाद को लेकर छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच चल रहे मामले में ट्रिब्यूनल ने दोनों राज्यों को महानदी बेसिन में जल उपलब्धता के ताजा आंकड़े पेश करने के निर्देश दिए हैं। ट्रिब्यूनल ने इस संबंध में 2 मई को अगली सुनवाई निर्धारित की है, जिस पर सभी की नजर है।
सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश बेला त्रिवेदी की अध्यक्षता में गठित इस ट्रिब्यूनल ने 20 अप्रैल को सुनवाई के दौरान दोनों राज्यों से जल से जुड़ी हाल की रिपोर्ट देने को कहा गया। यह आदेश इसलिए जारी किया गया है ताकि दोनों पक्षों की ओर से वर्तमान जल प्रवाह और उपलब्धता की सही स्थिति ट्रिब्यूनल के समक्ष प्रस्तुत हो सके।
महानदी बेसिन में कुल 14 नदियाँ आती हैं, जिनमें से 9 नदियाँ छत्तीसगढ़ में और शेष ओडिशा में बहती हैं। छत्तीसगढ़ की नदियाँ मुख्य रूप से महानदी, शिवनाथ, हसदेव, अरपा, खारुन, पैरी, सोंढूर, मंड और जोंक के ऊपरी हिस्से हैं। वहीं, ओडिशा में महानदी, इब, तेल, ओंग और जोंक के निचले हिस्से महत्वपूर्ण हैं। ओडिशा की नदियाँ जल प्रवाह में कम संख्या होने के बावजूद काफी अहम भूमिका निभाती हैं, खासकर डेल्टा निर्माण में।
ट्रिब्यूनल ने दोनों राज्यों का बेसिन क्षेत्र का निरीक्षण भी किया और जल संबंधी आंकड़ों पर अधिकारियों से चर्चा की। ओडिशा सरकार ने गर्मी के मौसम में अधिक पानी की मांग की है, जबकि छत्तीसगढ़ ने जल स्तर कम होने का हवाला दिया है और अतिरिक्त जल रिहाई में असमर्थता जताई है।
अधिकारियों के अनुसार, गर्मी के मौसम में जल स्तर घटता है, जिससे अतिरिक्त जल उपलब्ध कराना कठिन होता है। दोनों राज्य इस बात पर सहमत हैं कि बड़े निर्माण कार्यों के बिना अतिरिक्त जल उपलब्ध कराना संभव नहीं है। टेक्निकल एक्सपर्ट कमेटी ने नए जल परियोजनाओं के प्रस्ताव तैयार किए हैं और अधूरे कार्यों पर लगी रोक हटाने पर भी सहमति बनी है।
महानदी लगभग 900 किलोमीटर लंबी है, जिसमें से 357 किलोमीटर छत्तीसगढ़ में और 494 किलोमीटर ओडिशा में बहती है। औद्योगीकरण और सिंचाई के विस्तार के कारण दोनों राज्यों के बीच जल विवाद काफी बढ़ गया है और यह मुद्दा लंबे समय से तनाव का कारण बना हुआ है।
इससे पहले भी इस मुद्दे पर दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री स्तर पर चर्चा कर चुके हैं। हाल ही में विष्णु देव साय और मोहन चरण मांझी की बैठक में इस विवाद के समाधान पर विशेष जोर दिया गया है।
अब 2 मई को होने वाली अगली सुनवाई को इस विवाद के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सभी संबंधित पक्ष इस सुनवाई में सकारात्मक प्रगति की उम्मीद कर रहे हैं, जिससे दोनों राज्यों के बीच स्थायी समझौता हो सके और महानदी के जल संसाधनों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित हो सके।

