मुंबई। महाराष्ट्र में कानून-व्यवस्था की गंभीर स्थिति और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर शिवसेना के उद्धव बालासाहेब ठाकरे (यूबीटी) ने केंद्र और राज्य सरकारों पर कड़ा आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि जहां केंद्र सरकार ने देशभर में मोबाइल फोन पर इमरजेंसी सायरन टेस्ट कर सुरक्षा के संदेश दिए, वहीं महाराष्ट्र में महिलाओं और बच्चियों के साथ हो रहे लगातार बलात्कार और अत्याचार की घटनाओं के बावजूद सरकारी तंत्र पूरी तरह से निष्क्रिय और खामोश है।
शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में प्रकाशित एक संपादकीय में पुणे जिले के भोर तहसील के नसरापुर में चार साल की बच्ची से बलात्कार और उसकी बाद हत्या की शर्मनाक घटना का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इस घटना ने पूरे इलाके में भारी आक्रोश फैला दिया है। स्थानीय लोग बच्ची के शव को सड़क पर लेकर प्रदर्शन करने लगे और आरोपी को सख्त सजा देने की मांग की, लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज कर दिया।
संपादकीय में कहा गया है कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने हाल ही में ट्रैफिक जाम के लिए जनता से माफी मांगी, जबकि महिलाओं और बच्चियों के प्रति हो रहे अमानवीय अत्याचारों पर कोई जवाब नहीं दिया। नसरापुर, चाकन और नागपुर में हिंसक घटनाएं सरकार की गृह विभाग की विफलता को उजागर करती हैं। इसलिए मुख्यमंत्री से यह अपेक्षा की गई है कि वे राज्य की सभी बच्चियों और महिलाओं से सार्वजनिक रूप से माफी मांगें।
लेख में विस्तार से बताया गया है कि पुणे और नागपुर जैसे शहरों में महिलाओं के खिलाफ इस प्रकार के अपराध बढ़ते जा रहे हैं, जिसे सरकार नजरअंदाज कर रही है। सांगली में भी महिलाओं के खिलाफ इसी तरह गंभीर अपराधों के मामले सामने आ रहे हैं। आरोप लगाया गया है कि सरकार अपराधियों को कानून का भय देना बंद कर चुकी है, जिससे उनकी निष्ठुरता बढ़ रही है।
मुख्यमंत्री फडणवीस को गृह मंत्री के रूप में पूरी तरह असफल बताया गया है क्योंकि वे कानून व्यवस्था के बजाय दूसरे राज्यों में राजनीतिक प्रचार करने में व्यस्त रहे। उनके दौरों का जिक्र करते हुए कहा गया है कि महाराष्ट्र की छवि चमकाने की कोशिशों के बावजूद प्रदेश के अंदर अपराध और भ्रष्टाचार फैले हुए हैं।
संपादकीय में भाजपा पर भी निशाना साधते हुए कहा गया है कि पश्चिम बंगाल के आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामले में भाजपा ने कड़ा विरोध जताया था, जबकि महाराष्ट्र में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों पर चुप्पी साध ली गई है। यह भी सवाल उठाया गया है कि सरकार बार-बार फास्ट ट्रैक कोर्ट और सख्त सजा की बात करती है, लेकिन दोषियों को वास्तविक सजा मिलती कहां है?
सरकार की “लड़की बहन योजना” पर भी कटाक्ष किया गया है, जिसमें प्रति माह 1500 रुपये की सहायता दी जाती है। सवाल उठाया गया है कि क्या इतनी आर्थिक सहायता देकर महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी तरह से निभाई जा सकती है?
समाप्त करते हुए संपादकीय में यह कहा गया है कि यह मात्र एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि मानवता और महिलाओं की गरिमा से जुड़ा सवाल है। सरकार से मांग की गई है कि वे प्रशासनिक या ट्रैफिक मुद्दों की जगह महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा में विफलता को लेकर सार्वजनिक माफी मांगें और ठोस कदम उठाएं।

