हॉर्मुज जलडमरूमध्य के बंद रहने के कारण एक गंभीर मानवीय संकट उभर कर सामने आया है। संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन ने इस संकट की गंभीरता को उजागर करते हुए उन नाविकों की मुश्किलों पर चिंता जताई है, जो इस जलडमरूमध्य या उसके आस-पास फंसे हुए हैं।
करीब 20,000 नाविक लगभग 2,000 जहाजों पर फंसे हुए हैं और उन्हें शारीरिक खतरे के साथ मानसिक दबाव का भी सामना करना पड़ रहा है, जो आमतौर पर सैन्य संघर्ष वाले क्षेत्रों में होता है। यह स्थिति उनके लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण और तनावपूर्ण साबित हो रही है।
इन नाविकों को हर दिन मिसाइल हमलों या आस-पास गिरने वाले मलबे के खतरे के बावजूद काम करना पड़ता है। पास के बंदरगाह भी सुरक्षित नहीं हैं, इसलिए वे आराम भी नहीं कर पाते। यह सब उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल रहा है।
अधिक चिंता की बात यह है कि उनके पास भोजन और पानी की आपूर्ति धीरे-धीरे खत्म हो रही है। उन्हें राशनिंग पर निर्भर रहना पड़ता है और कैसेटीन मिशन टू सीफेरर्स जैसी दानदाता संस्थाओं से सहायता मिलती है, जो स्वयं जोखिम भरे हालात में काम कर रही हैं।
जैसे-जैसे संकट लंबा खिंचता जा रहा है, नाविकों के अनुबंध समाप्त होने के बाद भी उन्हें काम करना पड़ सकता है। इससे भुगतान के जोखिम और घर वापसी में मुश्किलें पैदा हो रही हैं। कुछ लोगों को ठगी का भी सामना करना पड़ रहा है, जहाँ धोखेबाज क्रिप्टोकरेंसी के बदले जलडमरूमध्य से सुरक्षित निकलने का झांसा दे रहे हैं।
यह संकट गहरा चिन्ताजनक है, लेकिन वास्तविकता यह है कि सामान्यतः भी नाविकों को खराब कार्य परिस्थितियों, वित्तीय असुरक्षा, मानसिक व शारीरिक जोखिम, अलगाव और अनिश्चित करियर अवसरों से जूझना पड़ता है। निरंतर थकान और नींद की कमी उनकी सामान्य स्थिति है।
इस प्रकार का संकट यह दर्शाता है कि वैश्विक राजनीतिक संघर्ष और आर्थिक अनिश्चितताओं के समय जान जोखिम में डालकर समुद्री मजदूरों का जीवन कितना कठिन और जोखिमपूर्ण होता है। ऐसे में इनके लिए स्थायी सुरक्षा और सहायता तंत्र की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।

