दूरदराज़ इलाक़ों की गलियों में खुले में शौच की समस्या आज भी एक गंभीर सामाजिक चुनौती बनी हुई है। यह समस्या केवल आधुनिक भारत का नहीं बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के समय से चली आ रही है। इस विषय को आधुनिक साहित्य में खुलकर दिखाने का एक प्रमुख उदाहरण अरविंद अडिगा का उपन्यास द व्हाइट टाइगर है, जिसने खुले में शौच की दयनीय हालत को कहीं ज्यादा मजबूती से सामने रखा है।
उपन्यास के एक अंश में लिखा गया है कि किस प्रकार गरीब लोग, जो शहर में अमीरों के लिए निर्माण कार्य करते हैं, वे स्वयं नीली तिरपाल की छतरियों के नीचे अस्वच्छ परिस्थितियों में रहते हैं। वे लोग नालियों से घिरे रास्तों में, खुले में शौच करते हैं, जिसके बदबू से पूरा इलाका दूषित होता है। यह दृश्य न केवल गंदगी को दर्शाता है, बल्कि फैली हुई सामाजिक असमानता का प्रतीक भी है।
भारत में खुले में शौच की प्रथा का इतिहास बहुत पुराना है। ब्रिटिश भारत में भी यह समस्या विद्यमान थी, जहाँ ग्रामीण एवं शहरी समुदायों के बीच स्वच्छता के प्रति जागरूकता की कमी थी। नालों और जल निकासी की उचित व्यवस्था न होने के कारण санитар कुप्रबंधन गहरा था। स्वतंत्रता के बाद भी यह सामाजिक बुराई कई दशकों तक जारी रही। सरकारी योजनाओं और जनजागरण के प्रयासों के बावजूद, कई इलाके खुले में शौच की प्रथा से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सके।
सरकार ने स्वच्छता और खुले में शौच की बीमारी को खत्म करने के लिए विभिन्न मिशनों की शुरूआत की, जिनमें सबसे प्रमुख 2014 में शुरू हुआ ‘स्वच्छ भारत अभियान’ है। इस अभियान ने ग्रामीण और शहरी इलाके दोनों में टॉयलेट निर्माण और उपयोग को बढ़ावा दिया। इसके प्रभाव से खुले में शौच करने वालों की संख्या में काफी कमी आई, लेकिन कई जगहों पर जागरूकता और व्यवहार में अभी भी परिवर्तन की आवश्यकता है।
अडिगा के उपन्यास की तरह साहित्य और मीडिया की भूमिका भी इस सामाजिक कुरीति को उजागर करने और लोगों की सोच बदलने में अहम है। खुले में शौच जैसी समस्या महज स्वच्छता का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव और आर्थिक विषमता से जुड़ी हुई है। अतः इसका समाधान केवल शौचालय निर्माण तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि एक सांस्कृतिक परिवर्तन आवश्यक है जिसमें सफाई, स्वास्थ्य और मानव सम्मान की अहमियत समझी जाए।
अतः, ब्रिटिश भारत से लेकर आज की दिल्ली की गलियों तक, खुला शौच एक चुनौती बनकर मौजूद है। यह आवश्यक है कि सरकारी पहल, समाजिक जागरूकता, और साहित्यिक अभिव्यक्ति साथ मिलकर इस समस्या का प्रभावी निदान निकालें ताकि आने वाली पीढ़ियां साफ-सुथरे और सम्मानजनक जीवनयापन के अधिकार से वंचित न हों।

