उदयपुर। देश-दुनिया में भगवान नारायण के दशावतार को समर्पित अनेक प्राचीन मंदिर देखने को मिलते हैं, लेकिन राजस्थान के उदयपुर से लगभग 22 किलोमीटर दूर नागदा गांव में स्थित ‘सास-बहू’ मंदिर अपनी अनोखी पहचान और भव्यता के कारण विशेष महत्व रखता है। यह मंदिर भगवान नारायण के सहस्रबाहु अवतार, यानी हजार भुजाओं वाले स्वरूप को समर्पित एक प्राचीन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है।
यह मंदिर 10वीं शताब्दी के अंत में कच्छपघात राजवंश के राजा महिपाल और रत्नपाल के द्वारा निर्मित कराया गया था। लगभग एक हजार वर्ष पुराना यह मंदिर ‘नागर’ वास्तुकला शैली के अंतर्गत आता है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के संरक्षण में है। इसकी बनावट, जटिल नक्काशी और मूर्तिकला कला स्थापत्य प्रेमियों और इतिहासकारों दोनों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।
मंदिर का मूल नाम ‘सहस्रबाहु’ था, जिसका अर्थ है ‘हजार भुजाओं वाला’ – यह भगवान विष्णु के उस दिव्य और महाशक्ति के स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें उनके हजार हाथ होते हैं। समय के साथ नाम में व्यंजन-परिवर्तन हुआ और स्थानीय बोलचाल की भाषा में इसे ‘सास-बहू’ के रूप में मान्यता मिलने लगी, जो आज के दौर में भी कई लोगों के लिए प्रश्नचिह्न बना हुआ है।
सास-बहू मंदिरों के नामकरण की विशेष बात यह है कि मंदिर परिसर में दो मुख्य मंदिर हैं। बड़े मंदिर को ‘सास’ और छोटे मंदिर को ‘बहू’ कहा जाता है। ‘सास’ मंदिर के चारों तरफ दस छोटे-छोटे मंदिर मौजूद हैं जबकि ‘बहू’ मंदिर में पांच छोटे मंदिर स्थित हैं। मंदिर परिसर का मुख्य आकर्षण पूर्व दिशा में स्थित मकर-तोरण है, जो स्थापत्य कला की एक अनूठी मिसाल है। दोनों मंदिरों का सामान्य लेआउट लगभग समान है, जिनमें पंचरथ गर्भगृह, अंतराल, सभा मंडप, और बरामदा शामिल हैं।
मंदिर की बाहरी दीवारों पर भगवान ब्रह्मा, शिव, विष्णु, राम, बलराम और परशुराम की मूर्तियां जटिलता से नक्काशी गई हैं। रामायण के प्रसंगों, देवी-देवताओं और दिव्य प्राणियों की भव्य मूर्तियां दीवारों को सजाती हैं, जो दर्शकों के लिए एक जीवंत इतिहास का चित्र प्रस्तुत करती हैं। मंदिर परिसर के उत्तर-पूर्व दिशा में एक छोटा मंदिर भी विशेष रूप से आकर्षक है, जिसमें पत्थर का सुंदर शिखर बना हुआ है और इस पर ब्रह्मा, शिव और विष्णु की मूर्तियां स्थापित हैं।
सास-बहू मंदिर परिसर धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, साथ ही राजस्थान की प्राचीन वास्तुकला की अमिट छाप भी यहाँ देखी जा सकती है। यह स्थल प्रकृति की गोद में बसा हुआ है, जहां पहाड़ियां और खजूर के पेड़ एक शांत और मनोहर वातावरण प्रदान करते हैं। यहां आसपास और भी पुरातात्विक स्थल, जैसे एकलिंगजी मंदिर जो महज तीन किलोमीटर दूर है, और बघेला झील के किनारे शांतिनाथ जैन मंदिर स्थित हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने पूरे परिसर को संरक्षित स्मारक घोषित किया है और आधुनिक तकनीक के माध्यम से 360 डिग्री वर्चुअल टूर की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है। इस तरह, भले ही पर्यटक दूर हों, वे भी इस ऐतिहासिक और स्थापत्य चमत्कार की भव्यता का अनुभव कर सकते हैं। सास-बहू मंदिर न केवल राजस्थान की धरोहर को संजोकर रखता है, बल्कि यह दर्शाता है कि हमारी सांस्कृतिक विरासत कितनी समृद्ध और जीवंत है।

