जब अंतिम संस्कार में मासूम आंखों ने शब्दों की जगह ले ली

Rashtrabaan

    लखनऊ। भैंसाकुंड घाट पर पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के छोटे बेटे प्रतीक यादव के अंतिम संस्कार के दौरान एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने हर किसी के दिल को झकझोर कर रख दिया। परिवार के सदस्यों की आंखों से उमड़ती भावनाएं और मासूम बच्चों की वे नज़रें, जो शब्दों की जगह अपनी पीड़ा बयां कर रही थीं, वहां मौजूद हर व्यक्ति के मन को छू गईं।

    चिता की आग धीमे-धीमे बुझ रही थी, लेकिन वहां एक छोटे बच्चे की आंखों में छलकता दर्द पूरी घटनास्थली को भावुकता से भर रहा था। प्रतीक यादव की दो बेटियां यहां अंतिम बार अपने पिता को विदा कर रही थीं। बड़ी बेटी अपने आंसुओं को रोकती नजर आ रही थी, तो छोटी बच्ची बार-बार आस-पास के लोगों को देख रही थी, शायद उम्मीद कर रही थी कि उसके पिता फिर से उसे अपनी गोदी में लेंगे।

    इस भावनात्मक घड़ी में श्मशान घाट की खामोशी भी बोलती नजर आ रही थी और हर कोई उस बच्चे की पीड़ा को महसूस कर पा रहा था। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव, जो राजनीतिक सभाओं में हमेशा संयमित लगते हैं, उस मौके पर परिवार के एक बड़े सदस्य की तरह अपनी जिम्मेदारी निभा रहे थे। उन्होंने छोटी बच्ची को चॉकलेट देते हुए उसे सांत्वना दी और उसके साथ बैठकर उसका ध्यान रखने की कोशिश की।

    प्रतीक यादव के अंतिम संस्कार पर मौजूद लोगों ने केवल राजनीति को भूलकर उस परिवार के दर्द को साझा किया। इंसानियत की इस अनुभूति में किसी भी राजनीतिक रंग की छाया नहीं थी। ज्यादा से ज्यादा देखा गया तो दो छोटे मासूम चेहरे थे, जो पहली बार अपने जीवन के सबसे बड़े झटके का सामना कर रहे थे। वहां मौजूद कुछ लोग आंसू रोक नहीं पा रहे थे और आंखों में आसूं छलक उठे।

    एक वरिष्ठ राजनेता ने कहा कि राजनीति अपनी जगह है, लेकिन बड़ा दिल होना हर किसी के बस की बात नहीं। दिवंगत मुलायम जी ने जो अपने परिवार में सम्मान स्थापित किया, वही छवि उनके बड़े बेटे अखिलेश यादव में साफ नजर आ रही थी। ऐसे दुख के समय में उन्होंने राजनीति को पीछे रखकर केवल परिवार को संभालने का काम किया, जोकि वास्तव में एक मजबूत और संवेदनशील नेतृत्व का परिचायक है।

    इस तरह, प्रतीक यादव के अंतिम संस्कार ने न केवल एक राजनीतिक और सामाजिक घटना का रूप लिया, बल्कि एक मानवीय भावनाओं से भरा ऐसा दृश्य प्रस्तुत किया, जिसने हर दर्शक के दिल को गहराई से छू लिया। उस दिन भैंसाकुंड घाट पर जिंदगी के अंत और रिश्तों की महत्ता को समझने का एक जीवंत सबूत सामने आया।

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