शहडोल, राष्ट्रबाण। शहडोल जिले का ब्यौहारी क्षेत्र इन दिनों अवैध रेत उत्खनन का ‘सेफ हेवन’ बन चुका है। यहाँ कानून का खौफ नहीं, बल्कि माफिया का ‘सिक्का’ चलता है। सोन नदी और उसके सहायक नदी-नालों से मशीनों के जरिए रात-दिन रेत की चोरी की जा रही है, लेकिन जिला प्रशासन और खनिज विभाग की चुप्पी कई गहरे सवाल खड़े कर रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में माफिया की दहशत इतनी है कि लोग खुलकर बोलने से कतराते हैं, क्योंकि ब्यौहारी का इतिहास सरकारी नुमाइंदों (पटवारी और एएसआई) की हत्याओं जैसे काले पन्नों से भरा पड़ा है। आखिर किसके संरक्षण में फल-फूल रहा है यह अवैध कारोबार? क्या प्रशासन की ‘उदासीनता’ माफिया के साथ किसी गुप्त समझौते की ओर इशारा कर रही है?
रात ढलते ही शुरू होता है ‘मौत का खेल’
ब्यौहारी क्षेत्र के टाँघर, गोल्हारा, बोडिड्या, बोकरा, बोकरी और जरुख़रा जैसे नदी-घाटों की शांति सूरज ढलते ही ट्रैक्टर-ट्रॉली और हाइवा की गड़गड़ाहट में तब्दील हो जाती है। सूत्रों की मानें तो यहाँ अवैध उत्खनन अब केवल फावड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रतिबंधित मशीनों का उपयोग कर नदियों का स्वरूप बिगाड़ा जा रहा है। रेत के अवैध परिवहन से न केवल राजस्व की चोरी हो रही है, बल्कि भारी वाहनों के दबाव से ग्रामीण सड़कें भी जर्जर होकर गड्ढों में तब्दील हो चुकी हैं।
तीन तिकड़ी और ‘सिंडिकेट’ का दबदबा
क्षेत्र में चर्चा है कि पूरा अवैध कारोबार एक संगठित सिंडिकेट के इशारे पर चल रहा है। स्थानीय सूत्रों ने गोल्डी, दीपू और वीरेंद्र नामक तीन व्यक्तियों की ‘तिकड़ी’ का नाम प्रमुखता से लिया है, जो बोकरा, बोकरी, टाँघर और गोल्हारा क्षेत्र में खनन के सूत्रधार बताए जा रहे हैं। वहीं, बोडिड्या क्षेत्र में निशांत नाम के व्यक्ति की सक्रियता की भी खबरें आम हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि ये नाम केवल मुखौटे हैं, इनके पीछे की असली ताकतें सत्ता के गलियारों में बैठी हैं, जो कार्रवाई की फाइलों को दफ्तरों से बाहर निकलने ही नहीं देतीं।
राजनीतिक संरक्षण; ‘खाकी’ बेबस, ‘खादी’ मौन
ब्यौहारी में रेत के खेल को बिना राजनीतिक वरदहस्त के चलाना नामुमकिन है। चर्चा है कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों की मौन सहमति और खनिज विभाग की कागजी कार्रवाई ने माफिया के हौसले सातवें आसमान पर पहुंचा दिए हैं। जब भी ग्रामीण शिकायत करते हैं, खनिज विभाग ‘छापेमारी’ का ढोंग करता है, लेकिन पहुँचने से पहले ही माफिया को सूचना मिल जाती है। यह ‘मुखबिर तंत्र’ विभाग के भीतर ही बैठा है या बाहर, यह जांच का विषय है।
पर्यावरण की बलि, प्यासी होगी भावी पीढ़ी
जानकारों की चेतावनी है कि अनियंत्रित उत्खनन से नदियों का प्राकृतिक प्रवाह पूरी तरह बाधित हो चुका है। रेत की कमी के कारण भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है, जिससे भविष्य में ब्यौहारी क्षेत्र में भीषण जल संकट की स्थिति बन सकती है। नदी किनारे बसे गांवों में कटाव की समस्या बढ़ गई है, जिससे किसानों की उपजाऊ जमीन नदियों में समा रही है। माफिया अपनी तिजोरियां भर रहे हैं और आम आदमी के हिस्से में सिर्फ धूल और प्यास आ रही है।
खूनी इतिहास से भी नहीं लिया सबक?
ब्यौहारी का इतिहास रेत माफिया के दुस्साहस का गवाह रहा है। पूर्व में अवैध उत्खनन रोकने गए एक पटवारी और एक एएसआई की निर्मम हत्या की घटनाएं आज भी लोगों के जेहन में ताज़ा हैं। इन घटनाओं के बावजूद प्रशासन का लचीला रुख समझ से परे है। क्या विभाग किसी और सरकारी कर्मचारी की शहादत का इंतज़ार कर रहा है? खनिज विभाग की छिटपुट कार्रवाई सिर्फ ‘खानापूर्ति’ बनकर रह गई है, जिससे अवैध कारोबारियों में कानून का कोई डर शेष नहीं बचा है।
भय में ग्रामीण, जिसने आवाज उठाई उस पर मामला दर्ज
रेत माफियाओं के आतंक से स्थानीय ग्रामीणों में दहशत का माहौल है। ग्रामीण बताते है जो जागरूक नागरिक इनके खिलाफ आवाज उठाता है वह कानून शिकार हो जाता है। इसका जीता जगाता उदहारण क्षेत्र का सरपंच है, जिसने रेत माफियाओं खिलाफ आवाज उठाई लेकिन उल्टा उस पर ही एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस भी रेत माफियाओं की सहयोगी बन कर उनकी गुलामी कर रही है और उसके बदले मोटा कमीशन खा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि ब्यौहारी के चिन्हित घाटों पर विशेष पुलिस बल तैनात किया जाए, जो रेत के अवैध कारोबार पर लगाम लगाए। खनिज विभाग के उन अधिकारियों की भूमिका की जांच हो, जिनके कार्यकाल में अवैध उत्खनन और परिवहन बढ़ा है और चिह्नित माफियाओं के वाहनों को राजसात किया जाए और उन पर कठोरतम ‘रासुका’ जैसी कार्रवाई हो।
ब्यौहारी में रेत का अवैध उत्खनन अपराध का पर्याय बन गया है जो शासन-प्रशासन की साख पर बट्टा लगा रहा है। अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह अवैध कारोबार न केवल पर्यावरण को निगल जाएगा, बल्कि क्षेत्र की कानून-व्यवस्था को भी पूरी तरह ध्वस्त कर देगा। अब गेंद कलेक्टर और एसपी शहडोल के पाले में है, वे माफिया पर प्रहार करते हैं या ‘उदासीनता’ का यह सिलसिला यूँ ही जारी रहेगा? यह भविष्य की गर्त पर छुपा है।
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