कस्यप श्रीनिवास के निर्देशन में बनी उनकी पहली फिल्म हास्य और फिल्मी व्यंग्य से भरपूर है, लेकिन यह अपनी कॉमिक ऊर्जा को बनाए रखने में संघर्ष करती नजर आती है। इसके माध्यम से निर्देशक ने फिल्म जगत की कुछ विशेषताओं और शैलीगत विशेषताओं पर तीखा व्यंग्य करने की कोशिश की है, लेकिन इसका असर पूरी फिल्म में समान रूप से नहीं दिखता।
फिल्म का मुख्य आकर्षण इसकी मेटा-ह्यूमर है, जहां दर्शकों को फिल्मों के पूर्वाग्रह, पूर्वानुमानों और क्लिशों का एहसास कराया जाता है। कई बार यह व्यंग्य दर्शकों को हंसाने में सफल होता है, परंतु इसके बावजूद यह हास्य कुछ हिस्सों में फ़िका पड़ जाता है। कॉमिक सीन्स की अपनी एक निरंतरता होनी चाहिए, जो इस फिल्म में थोड़ी कमजोर नजर आती है।
फिल्म की कहानी और पटकथा में कुछ कॉमिक हाइलाइट्स जरूर हैं, लेकिन वे पूरी फिल्म को लयबद्ध और मजेदार बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। कई बार लगाता है कि कुछ दृश्यों का समायोजन बेहतर हो सकता था ताकि कहानी में निरंतरता बनी रहे। कस्यप श्रीनिवास द्वारा फिल्म में प्रयुक्त रोचक सीन और फिल्म जगत के व्यंग्य से भरे संवाद भी दर्शकों को बांधते हैं, खासकर उन फिल्म प्रेमियों के लिए जो फिल्मों के अंदर छिपे जटिल पहलुओं को समझना पसंद करते हैं।
कुल मिलाकर, यह फिल्म हिंदी सिनेमा में हास्य और विनोद के क्षेत्र में एक प्रयोग के रूप में देखी जा सकती है। हालांकि यह सभी दर्शकों के हास्य के स्वाद को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाती, लेकिन इसके प्रयास और नवीन विचार निश्चित रूप से सराहनीय हैं। आगामी प्रोजेक्ट्स में यदि निर्देशन और पटकथा में संतुलन बना रहे, तो कस्यप श्रीनिवास एक सफल हास्य निर्देशक के रूप में उभर सकते हैं।

