मुंबई। एनसीपी-एसपी के प्रमुख नेता फहद अहमद ने तमिलनाडु विधानसभा में विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन की सनातन धर्म के खिलाफ दिए गए बयान की तीखी निंदा की है। उन्होंने इस बयान को बचकाना और अनुचित बताया और कहा कि ऐसे बयानों से समाज में गलत संदेश जाता है।
तमिलनाडु में हाल ही में नए मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के शपथ ग्रहण समारोह में उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म को खत्म करने की बात कही थी, जिसने राजनीतिक माहौल को गर्मा दिया है। इस बयान के बाद राजनीतिक दलों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई है।
फहद अहमद ने कहा, “उदयनिधि स्टालिन का यह बयान अनुचित और पूरी तरह से अपरिपक्व है। धर्मों का सम्मान करना हमारा संविधानिक और नैतिक कर्तव्य है। किसी भी धर्म विशेष के खिलाफ ऐसी टिप्पणी करना गलत है और इससे समाज में गलतफहमी फैलती है।” उन्होंने इसे शर्मनाक भी बताया और कहा कि हर धर्म का सम्मान होना चाहिए।
उन्होंने कांग्रेस की उस रणनीति की भी प्रशंसा की जिसमें कांग्रेस ने डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन से अलग होकर विजय के नेतृत्व वाली पार्टी टीवीके को समर्थन दिया ताकि वह तमिलनाडु विधानसभा में बहुमत हासिल कर सके। अहमद ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस एनसीपी-एसपी के सहयोगी हैं और डीएमके द्वारा दिए गए ऐसे विवादित बयान से गठबंधन में प्रतिक्रिया पैदा हुई।
अहमद ने बताया कि हमारा संविधान सभी धर्मों को समान अधिकार देता है और भारत की अधिकांश आबादी हिंदू धर्म के अनुयायी हैं। उन्होंने कहा, “अगर किसी को लगता है कि किसी धर्म में सुधार की जरूरत है तो उसे समाज सुधार के रास्ते पर चलना चाहिए, न कि धर्म के खिलाफ सीधे टिप्पणी करनी चाहिए। यह बात मुस्लिम धर्म और अन्य धर्मों पर भी लागू होती है।”
उन्होंने पुनः उदयनिधि स्टालिन के दिए बयान को बचकाना बताते हुए कहा, “तमिलनाडु के शिक्षित और जागरूक लोग अपने नेता से ऐसे बयान की उम्मीद नहीं करते। ऐसे बयान राजनीतिक विवाद को जन्म देते हैं, जो कि नकारात्मक हैं।”
इस मामले पर भाजपा की नाजिया इलाही खान ने कहा कि तमिलनाडु की जनता ने विजय को अपना जनादेश देकर डीएमके को जवाब दिया है। उन्होंने कांग्रेस, भाजपा और अन्य पार्टियों से अपील की कि वे राजनीति में धर्म को शामिल न करें। उन्होंने कहा, “राजनीतिक दलों के बीच लड़ाई हो सकती है, लेकिन भगवान राम से लड़ना ठीक नहीं है। सनातन धर्म के खिलाफ लड़ाई कोई स्वीकार नहीं करेगा।”
यह विवाद तमिलनाडु की राजनीति में सनातन धर्म के प्रति संवेदनशीलता को उजागर करता है और यह संकेत देता है कि धार्मिक भावनाओं को लेकर नेताओं को अधिक जिम्मेदार और सतर्क रहना होगा। समाज में सहिष्णुता और समरसता बनाए रखना हर नेता और नागरिक की जिम्मेदारी है।

