अलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश ने कहा, मानवाधिकार आयोग मुसलमानों की पिटाई की घटनाओं को नजरअंदाज कर रहा है

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    अलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश ने आरोप लगाया है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) देश में मुसलमानों की पिटाई की घटनाओं को अनदेखा कर रहा है और इसके बजाय ऐसे मामलों में उलझा हुआ है जो प्रथमतः उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। यह जानकारी लाइव लॉ ने बुधवार को दी।

    यह मामला मदरसा शिक्षकों की एसोसिएशन द्वारा फरवरी 2025 में जारी एक निर्देश के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई के दौरान उठा। न्यायाधीश अतुल श्रीधरन ने सोमवार को कहा कि यह देख कर हैरानी होती है कि देश के मानवाधिकार आयोग अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसे मामलों में दखल दे रहे हैं जिनका उनसे कोई वास्ता नहीं है। इस बात की जानकारी द इंडियन एक्सप्रेस ने दी।

    हालांकि, उसी डिवीजन बेंच का हिस्सा न्यायाधीश विवेक सारण ने इस तरह के व्यापक निष्कर्षों से असहमतता जताई। उन्होंने कहा कि इस मामले में एकसमान विचार नहीं रखे जा सकते।

    मामले की पृष्ठभूमि यह है कि फरवरी 2025 में मानवाधिकार आयोग ने उत्तर प्रदेश में सहायता प्राप्त 558 मदरसों के खिलाफ वित्तीय अनियमितताओं की जांच के लिए आर्थिक अपराध शाखा को आदेश दिया था, जैसा कि द हिन्दू ने रिपोर्ट किया।

    यह जांच आयोग के समक्ष दर्ज एक शिकायत के बाद शुरू की गई जिसमें सरकारी अनुदानों के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के माध्यम से अनपढ़ शिक्षकों की नियुक्ति के आरोप लगाए गए थे।

    इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट को बताया कि मानवाधिकार आयोग के पास ऐसी शिकायतों की जांच करने का अधिकार नहीं है जो एक वर्ष से अधिक पुराने हैं। उन्होंने मामले की सुनवाई स्थगित कराए जाने की भी मांग की।

    न्यायाधीश श्रीधरन ने सोमवार को आदेश में कहा कि वे मानवाधिकार आयोग द्वारा जांच आदेश को लेकर प्रारंभिक रूप से आश्चर्यचकित हैं। उन्होंने अपने तर्क में कहा कि आयोग को अपने दायरे का पालन करना चाहिए और बिना ठोस आधार के ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

    मानवाधिकार आयोग द्वारा जारी आदेश और हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई इस बात की चर्चा का विषय बनी हुई है कि मानवाधिकार संरक्षण की जिम्मेदारी निभाने वाले संस्थान कब और कैसे अपनी सीमाओं का निर्धारण करें।

    यह मामला न केवल धार्मिक उपक्रमों की निगरानी से सम्बंधित है, बल्कि इस बात पर भी सवाल उठाता है कि क्या मानवाधिकार आयोग की भूमिका केवल अत्याचार के मामलों तक सीमित रहनी चाहिए या उसका दायरा विस्तृत होना चाहिए।

    इस विवादित मुद्दे पर न्यायालय के दो निष्पक्ष मत और आयोग की प्रतिक्रिया आने वाले दिनों में सामने आ सकती है, जिससे इस केस का रुख स्पष्ट होगा।

    जैसे-जैसे मामला आगे बढ़ेगा, देश में मानवाधिकार संरक्षण, धार्मिक संस्थाओं की निगरानी और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं पर बहस भी गहराती जाएगी।

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