कोलकाता हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखते हुए तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) द्वारा चुनाव आयोग के पश्चिम बंगाल चुनाव परिणामों की गिनती में संघ सरकार के कर्मचारियों को पर्यवेक्षक बनाए जाने के निर्देश के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई की। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने की, जिन्होंने दोनों पक्षों के तर्क विस्तार से सुने।
पश्चिम बंगाल में मतदान दो चरणों में संपन्न हुआ, पहला चरण 23 अप्रैल को और दूसरा बुधवार को। मतदान प्रतिशत राज्य में रिकॉर्ड 92.4% दर्ज किया गया, जो चुनाव आयोग द्वारा आधिकारिक तौर पर बताया गया। मतदान समाप्त होने के बाद अब सभी मतदान केंद्रों पर वोटों की गिनती सोमवार को होगी।
इस गिनती प्रक्रिया के दौरान राज्य मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने निर्देश दिया कि प्रत्येक गिनती केंद्र पर कम से कम एक व्यक्ति संघ सरकार का कर्मचारी होगा। इस निर्देश पर टीएमसी ने सवाल उठाते हुए अपने वकील कल्याण बंदोपाध्याय के माध्यम से कहा कि यह आदेश निर्वाचक प्रक्रिया के दायरे से बाहर है क्योंकि पाकिस्तान की Representation of People Act में केवल मुख्य चुनाव आयुक्त का नाम लिया गया है न कि राज्य स्तर के अधिकारी का।
कल्याण बंदोपाध्याय ने तर्क दिया कि गिनती के समय उन लोगों को लाना जो मतदान प्रक्रिया का हिस्सा नहीं थे, उचित नहीं है। उन्होंने यह भी पूछा कि पूरे मतदान की प्रक्रिया में राज्य सरकार के कर्मचारियों की मदद ली गई है; फिर अचानक संघ कर्मचारियों को गिनती प्रक्रिया में क्यों शामिल किया जा रहा है। बंदोपाध्याय ने कहा, “विधायक प्रक्रिया में केंद्रीय कर्मचारियों की आवश्यकता क्यों पड़ी है जबकि राज्य कर्मचारी पूरी प्रक्रिया में लगे हुए हैं?”
टीएमसी के इस विरोध के बावजूद, चुनाव आयोग ने गिनती केंद्रों पर केंद्रीय कर्मचारियों की नियुक्ति को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट की है कि इससे निष्पक्ष और पारदर्शी गिनती सुनिश्चित होगी।
हाईकोर्ट ने मामले में सुनवाई पूरी कर ली है और अब आदेश सुरक्षित रखा है। इस फैसले का राज्य के चुनावी माहौल और भविष्य के चुनाव संचालन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ने की संभावना है।
हाईकोर्ट के फैसले का इंतजार सभी राजनीतिक दल, चुनाव आयोग और जनता उत्सुकता से कर रही है। ये फैसला आने वाले समय में राज्य में चुनाव प्रक्रिया संबंधित नीतियों पर बड़ा असर डाल सकता है।
इस पृष्ठभूमि में टीएमसी का कहना है कि चुनाव आयोग का यह कदम राजनीतिक पक्षपात को बढ़ावा दे सकता है जबकि चुनाव आयोग इसे निष्पक्षता और कानून के तहत आवश्यक मानता है।
चुनाव आयोग और टीएमसी के बीच यह विवाद तैयारियों और गिनती व्यवस्था की निष्पक्षता पर गहरी बहस का विषय बन गया है। आगामी हाईकोर्ट का निर्णय इस बहस को अनिवार्य रूप से नई दिशा देगा।
पिछले चुनावों की तुलना में इस बार मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी ने चुनाव की साख को मजबूती दी है। इसके साथ ही चुनाव प्रक्रिया का पारदर्शी होना लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
राज्य में आगामी चुनावों के लिए यह मामला भी एक मिसाल स्थापित कर सकता है कि कैसे चुनाव प्रक्रिया में कर्मचारियों की तैनाती और उनकी भूमिका को लेकर कानूनी दायरे तय किए जाते हैं।

