मुंबई। हिंदी साहित्य और व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में शरद जोशी का नाम गर्व से लिया जाता है। उन्होंने सरकारी नौकरी की सुरक्षित जिंदगी छोड़ समाज और राजनीति पर कटाक्ष करते हुए साहित्य को अपनी पूरी जिंदगी बना लिया। शरद जोशी का मानना था कि “लेखन जिंदगी जी लेने की एक तरकीब है,” और इसी सोच को अपनाकर उन्होंने जीवनभर लेखन की मशाल को थामे रखा।
शरद जोशी ने मध्य प्रदेश सरकार के सूचना एवं प्रकाशन विभाग में सेवा के दौरान प्रतिभा दिखाई, लेकिन भीतर से साहित्य की ओर उनकी लगन उन्हें नौकरी छोड़ने के लिए प्रेरित कर गई। वह जानते थे कि इस निर्णय में जोखिम था, परंतु अपने विचारों और अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए उन्होंने चुनौतियों का सामना किया और पूर्णकालिक लेखक के रूप में अपनी पहचान बनाई।
उनकी लेखनी का दायरा व्यापक रहा है। शरद जोशी ने ‘कादम्बरी’, ‘ज्ञानोदय’ जैसे प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में नियमित लेख और व्यंग्य प्रस्तुत किए। उनकी लेखनी में समाज की विसंगतियों, भ्रष्टाचार और राजनीतिक व्यवस्थाओं की सच्चाई गहराई से झलकती थी। व्यंग्य में हास्य की मिठास के साथ गंभीर संदेश देना उनकी खासियत थी, जो पाठकों को सोचने पर मजबूर करता था और मनोरंजन भी प्रदान करता था।
शरद जोशी का जन्म 21 मई 1931 को हुआ था। उन्होंने मध्य प्रदेश के उज्जैन और रतलाम में शिक्षा ग्रहण की एवं स्नातक की पढ़ाई इंदौर से पूरी की। कॉलेज के दिनों से ही उनका रुझान लेखन की ओर था। परिवार की इच्छा के विपरीत भी, उन्होंने साहित्य को जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाया। प्रारंभ में छद्म नामों से पत्र-पत्रिकाओं में उन्होंने लेखन शुरू किया, जो धीरे-धीरे पहचान में बदला और वे हिंदी व्यंग्य साहित्य के प्रमुख लेखकों में शामिल हो गए।
शरद जोशी कहते थे कि लेखक होना किसी बड़े अधिकारी से भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि लेखक की रचनाएं उसे अमर बना देती हैं। वे हमेशा कहते थे, “लेखक कभी रिटायर नहीं होता।” उनकी यही सोच उनके जीवन और साहित्य में स्पष्ट रूप से झलकती थी। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा, “इतना लिख लेने के बाद मैं केवल यह कह सकता हूं कि चलो, इतने वर्षों जी लिए। मेरे लिए यह जीवन जीने का एक बेहतरीन बहाना बन गया।”
शरद जोशी ने केवल साहित्य तक सीमित नहीं रहकर फिल्मों और टेलीविजन के लिए भी कई यादगार कार्य किए। उन्होंने ‘दिल है कि मानता नहीं’ जैसी फिल्म के संवाद लिखे, जिन्हें दर्शकों ने खूब सराहा। इसके अलावा ‘क्षितिज’, ‘उड़ान’, ‘गोधूलि’, ‘सांच को आंच नहीं’, ‘उत्सव’ और ‘चोरनी’ जैसे टीवी कार्यक्रमों और फिल्मों में उनका योगदान रहा। उनके व्यंग्य नाटकों में ‘अंधों का हाथी’ और ‘एक था गधा उर्फ अलादाद खां’ खूब लोकप्रिय हुए। साहित्य जगत में ‘जीप पर सवार इल्लियां’, ‘हम भ्रष्टों के भ्रष्ट हमारे’, ‘यत्र-तत्र-सर्वत्र’, ‘राग भोपाली’, ‘परिक्रमा’ और ‘नदी में खड़ा कवि’ जैसी रचनाएं भी उन्हें विशेष स्थान देती हैं।
हिंदी व्यंग्य साहित्य को नई पहचान दिलाने वाले शरद जोशी का 5 सितंबर 1991 को मुंबई में निधन हो गया। उनकी लेखनी आज भी हिंदी साहित्य प्रेमियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनी हुई है।

