सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने ‘परजीवियों’ द्वारा न्यायपालिका पर बढ़ते प्रवेशों की निंदा की

Rashtrabaan

    सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत ने समाज में कुछ ऐसे लोगों की मौजूदगी पर चिंता जताई है, जो प्रणाली पर निरंतर हमले करते रहते हैं। उनका कहना है कि ये लोग समाज के परजीवी हैं, जिनके पास न तो कोई स्थायी रोजगार होता है और न ही वे किसी पेशे में अपनी जगह बना पाते हैं।

    मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि ऐसे लोग विभिन्न रूपों में प्रकट होते हैं। कुछ मीडिया के माध्यम से, कुछ सोशल मीडिया पर और कुछ RTI एक्टिविस्ट के तौर पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं, मगर इनका मकसद केवल दूसरों पर आरोप-प्रत्यारोप लगाना और सिस्टम के खिलाफ आवाज उठाना होता है। उन्होंने कहा, “ये सब मिलकर प्रणाली पर हमला करते हैं, जिससे न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचता है।”

    सूर्य कांत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका समाज में विश्वास की एक मजबूत नींव है और इसे कमजोर करने वाला कोई भी प्रयास, देश की अखंडता के लिए खतरा है। उन्होंने सभी से आग्रह किया कि वे न्यायालयों का सम्मान करें और बिना प्रमाण के आरोप लगाने से परहेज करें।

    देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुखिया द्वारा यह बयान ऐसे समय में आया है जब अधिवक्ताओं और न्यायिक संस्थानों पर अनेक आलोचनाएँ और दबाव हो रहे हैं। CJI का यह मानना है कि असंतोष व्यक्त करने के अधिकार को मान्यता देते हुए भी, कानून का उल्लंघन करना उचित नहीं है और समाज में व्याप्त कर्तव्यों का सम्मान जरूरी है।

    उन्होंने मीडिया एवं सोशल मीडिया के प्रभाव पर भी ध्यान दिलाया, जहां कुछ सेक्शन अप्रत्यक्ष रूप से जंगली अफवाहें फैलाते हैं और न्यायपालिका की विश्वसनीयता को प्रभावित करते हैं। CJI के मुताबिक, न्यायपालिका ने हमेशा ही न्यायसंगत और निष्पक्ष फैसलों के जरिए देश की कानून व्यवस्था बनाए रखने का प्रयास किया है।

    इस प्रकार, न्यायपालिका को संदिग्ध और नकारात्मक आलोचनाओं से बचाना आवश्यक है, ताकि वह अपना कार्य निर्बाध रूप से जारी रख सके। CJI सूर्य कांत ने स्पष्ट किया कि न्यायालय पर हमले करने वाले ‘परजीवी’ समाज के लिए हानिकारक हैं और उनकी पहचान कर उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।

    यह बयान न्यायपालिका की गरिमा को बनाए रखने और उसके प्रति समाज में विश्वास को पुनः स्थापित करने के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। न्यायपालिका पर भरोसा ही लोकतंत्र की मजबूती का आधार है, और इसे कमजोर होने से रोकना हर नागरिक का कर्तव्य होना चाहिए।

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