अमेरिका ने भारत को अपनी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) ‘प्रायोरिटी वॉच लिस्ट’ में शामिल रखा है। यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) की सेक्शन 301 रिपोर्ट में भारत के पेटेंट कानूनों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। विशेष रूप से, रिपोर्ट में भारत द्वारा संभावित पेटेंट रद्द करने के खतरों का उल्लेख किया गया है, जिससे अमेरिकी कंपनियों के हित प्रभावित हो सकते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, फार्मास्यूटिकल सेक्टर में पेटेंट पेटेंट रद्द करने की स्थिति को लेकर अमेरिका ने निरंतर नजर रखी है। भारतीय सरकार की यह पहल कि वह दवाओं की कीमतों को कम करने के लिए पेटेंट संबंधी नियमों को सख्त बनाती है, अमेरिकी फार्मा कंपनियों के लिए चिंता का विषय बन गई है। इससे उनकी नई और महंगी दवाओं के पेटेंट खतरे में पड़ सकते हैं और बाजार में उनकी पकड़ कमजोर हो सकती है।
यूएसटीआर रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में पेटेंट कानूनों के प्रावधान अमेरिकी निवेशकों और दावेदारों के लिए उचित सुरक्षा प्रदान नहीं करते। अमेरिका की यह मांग है कि भारत अपने आईपी संरक्षण नीतियों में सुधार करे ताकि विदेशी पेटेंट धारकों का अधिकार सुरक्षित रहे।
भारत की घरेलू नीतियों में बदलाव, जो जनहित को ध्यान में रखकर दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने की दिशा में हैं, अमेरिकी कंपनियों को आर्थिक नुकसान पहुंचाने वाले माने जा रहे हैं। फार्मा सेक्टर में विदेशी निवेश को प्रभावित करने के साथ ही यह वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को भी चुनौती देता है।
हालांकि भारत ने अपनी नीतियों को सार्वजनिक स्वास्थ्य और किफायती दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के मकसद से समझाया है, फिर भी अमेरिका इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाए हुए है। ट्रेड эксперт्स का मानना है कि आगे भी यह मामला काफी समय तक जारी रह सकता है और इसके लिए दोनों पक्षों के बीच और वार्ताएं हो सकती हैं।
इस स्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत की आईपी नीति में बदलाव के बिना अमेरिका की प्रायोरिटी वॉच लिस्ट से निकाला जाना मुश्किल होगा। भारत के लिए यह चुनौती है कि वह अपने हितों और वैश्विक व्यापारिक दबावों के बीच संतुलन बनाए रखे।

