भोजशाला मामले में हाईकोर्ट के फैसले को भाजपा ने किया ऐतिहासिक करार, मुस्लिम संगठनों ने जताया विरोध

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    लखनऊ। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को सरस्वती मंदिर घोषित किए जाने के फैसले ने राजनीतिक और धार्मिक संगठनों के बीच व्यापक प्रतिक्रियाएं उभारी हैं। इस फैसले को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने ऐतिहासिक बताया है, जबकि कुछ मुस्लिम संगठनों ने इसे खारिज कर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की घोषणा की है।

    भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह लंबे समय से विवादित रहे इस मामले का न्यायिक प्रक्रिया के तहत समाधान है। उनका मानना है कि यह फैसला न्याय की निरंतरता और प्रगति को दर्शाता है और पूरे देश में सकारात्मक प्रभाव डालेगा।

    वहीं मुस्लिम संगठनों ने हाईकोर्ट के निर्णय का कड़ा विरोध जताया है। बरेली में ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि मुस्लिम समुदाय इस निर्णय से बेहद असंतुष्ट है।

    ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने भी हाईकोर्ट के फैसले को खारिज किया है और इसे ऐतिहासिक तथ्यों, सरकारी रिकॉर्ड, पुरातात्विक सबूतों तथा भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (एएसआई) के पिछले रुख के खिलाफ बताया है। बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि कमाल मौला मस्जिद कमेटी इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी, और वे कानूनी लड़ाई में हर संभव सहायता प्रदान करेंगे।

    भाजपा का कहना है कि यह फैसला वर्षों चली पुरातात्त्विक एवं ऐतिहासिक जांचों के आधार पर लिया गया है, इसलिए इसे सभी पक्षों को स्वीकार करना चाहिए। वहीं, मुस्लिम संगठन इस बात पर जोर दे रहे हैं कि भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर सदियों से मस्जिद के रूप में इस्तेमाल होता आ रहा है और कोर्ट के निर्णय में तथ्यों की अनदेखी हुई है।

    यह विवाद 2003 से लगातार चल रहा है। 2024 में हाईकोर्ट ने एएसआई सर्वेक्षण के आधार पर यह फैसला दिया था, जिसके बाद दोनों पक्षों में तीखी बहस छिड़ गई थी। फैसले के बाद उत्तर प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में इस विषय पर गहरे विचार विमर्श एवं चर्चा हुई है। भाजपा इसे सनातन संस्कृति की बड़ी जीत के रूप में देख रही है, जबकि मुस्लिम समूह इसे धार्मिक स्थलों में हस्तक्षेप और अतिक्रमण का प्रयास मान रहे हैं।

    यह मामला सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से प्रभावी बना हुआ है, जो आगे भी अदालतों और जनमानस के बीच बहस का विषय बना रहेगा। सभी संबंधित पक्षों से अपेक्षा की जा रही है कि वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रख करें और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करें।

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