तेल की कीमतों में उछाल से रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर 95.3 तक गिरा

Rashtrabaan

    भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गुरुवार को रिकॉर्ड निचले स्तर 95.3 पर गिर गया, जिसका मुख्य कारण वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में भारी उछाल और घरेलू इक्विटी बाजारों में बिकवाली रही।

    इंटरबैंक विदेशी विनिमय बाजार में रुपया 95 के स्तर पर खुला और कारोबार के दौरान 46 पैसे की गिरावट के साथ 95.3 तक पहुंच गया। हालांकि दिन के अंत तक यह 94.2 के स्तर पर वापस आ गया। बुधवार को रुपया 20 पैसे गिरकर 94.8 के रिकॉर्ड निम्न स्तर पर बंद हुआ था।

    ग्लोबल स्तर पर तेल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी देखने को मिली, जो चार वर्षों में सबसे उच्च स्तर पर पहुंच गईं। यह बढ़ोतरी अमेरिका के इरान के बंदरगाहों पर संभावित लंबे समय तक बैरिकेड लगाने की खबर के बाद हुई।

    ब्रेंट क्रूड की कीमतें $126.4 प्रति बैरल तक पहुंची, जो बाद में $116 प्रति बैरल पर आ गईं। 27 फरवरी को जो हिंसक संघर्ष शुरू हुआ उसके एक दिन पहले ब्रेंट क्रूड की कीमत $78 प्रति बैरल थी।

    द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने मंगलवार को बताया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अधिकारियों को इरानी निर्यात पर दबाव बनाने और तेहरान को शांति समझौते के लिए मजबूर करने हेतु बंदरगाहों पर विस्तारित बैरिकेड की योजना तैयार करने का निर्देश दिया है।

    इस अस्थिरता के चलते बुधवार को वैश्विक तेल की कीमतें 3% से अधिक बढ़कर $114.8 प्रति बैरल हो गईं।

    भारत में भी शेयर बाजार में भारी गिरावट देखी गई। सेंसेक्स में गिरावट के कारण निवेशकों में बेचैनी बढ़ी और यह आर्थिक दबाव रुपया कमजोर होने का एक प्रमुख कारण बना।

    मौजूदा स्थिति में तेल की बढ़ती कीमतें भारत जैसे तेल आयातक देशों की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से मुद्रास्फीति की संभावना बढ़ जाती है और चालू खाता घाटा भी बढ़ सकता है, जिससे स्थानीय मुद्रा पर दबाव बढ़ता है।

    विश्लेषकों का कहना है कि अगर वैश्विक तेल की कीमतें इसी तरह बनी रहती हैं या बढ़ती हैं तो रुपया और कमजोर हो सकता है। इसके अतिरिक्त विदेशी निवेशकों के भारतीय बाजारों से निकलने की भी संभावना बनी है, जो मुद्रा की गिरावट को और बढ़ावा दे सकती है।

    सरकारी तंत्र और रिजर्व बैंक को मौजूदा समय में स्थिति पर कड़ी नजर रखनी होगी और यदि आवश्यक हुआ तो बाजार में हस्तक्षेप कर मुद्रा को स्थिर रखने का प्रयास करना होगा।

    इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि वैश्विक आर्थिक घटनाएं सीधे तौर पर घरेलू बाजारों और मुद्रा पर प्रभाव डालती हैं। तेल की कीमतों में कोई भी बदलाव न सिर्फ ऊर्जा पर निर्भर उद्योगों को प्रभावित करता है, बल्कि आम जनता की जेब पर भी प्रभाव छोड़ता है। इसलिए मौजूदा समय में सतर्कता और रणनीतिक कदम आवश्यक हैं ताकि आर्थिक स्थिरता बनी रहे।

    Source

    TAGGED:
    error: Content is protected !!