Sawan Special : मध्यप्रदेश का प्राचीन Mahakal मंदिर का जानिए इतिहास, यहां होती है भस्म आरती

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भारत देश में मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग देश का इकलौता दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग हैं। यहां पर भगवान शिव भक्तों को कालों के काल महाकाल के रूप में दर्शन देते हैं। महाकाल मंदिर से जुड़ी कई प्राचीन परंपराएं और रहस्य हैं। बताया जाता है कि अवंतिकापुरी के राजा विक्रमादित्य बाबा महाकाल के परम भक्त थे और भगवान शिव के ही आशीष से उन्होंने यहां करीब 132 सालों तक शासन किया था। महाकालेश्वर मंदिर कितना प्राचीन है इसकी सटीक जानकारी बताना बेहद मुश्किल है। लेकिन सदियों से यह स्थान शिव भक्तो की आस्था का केंद्र है।
मंदिर का इतिहास बेहद ही रोचक है। मुगलों और ब्रिटिश हुकूमत के आधीन होने के बाद भी इस पावन स्थल ने अपनी पुरातन पहचान को नहीं खोया। सनातन धर्म की पताका को ऊंचा रखने के लिए धर्म की रक्षा से जुड़े लोगों ने ज्योतिर्लिंग को कई तरह के जतन कर आक्रांताओं से सुरक्षित रखा। कई दशक बीत जाने के बाद वर्तमान दौर में मंदिर का एक अलग ही स्वरूप दर्शनार्थियों को देखने को मिलता है, वहीं 11 अक्टूबर महाकाल लोक के लोकार्पण के बाद लोग उज्जैन के एक अलग वैभव को देख रहे है। तो हम रूबरू कराते है ऐतिहासिक प्राचीन मंदिर महाकालेश्वर के इतिहास से।

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ज्योतिर्लिंग को रखा गया था कुएं में छिपाकर
माना जाता है कि 1235 में महाकालेश्वर मंदिर को दिल्ली के मुग़ल सल्तनत के इल्तुतमिश ने पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया था। आक्रमण के दौर पर महाकाल मंदिर के गर्भगृह में स्थित स्वयंभू ज्योतिर्लिंग को आक्रांताओं से सुरक्षित बचाने के लिए लगभग 550 वर्षों तक पास में एक कुएं में रखा गया था। मुग़ल सम्राट औरंगजेब ने मंदिर के अवशेषों से एक मस्जिद का निर्माण करा दिया था। मंदिर टूटने के बाद 500 वर्षों से अधिक समय तक महाकाल मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में ही रहा और इसी ध्वस्त मंदिर में महादेव की पूजा आराधना की जाती थी, लेकिन जब कई वर्षों बाद 22 नवंबर 1728 में मराठा शूरवीर राणोजी राव सिंधिया ने मुगलों को परास्त किया तो उन्होंने मंदिर तोड़कर बनाई गई उस मस्जिद को गिराया दिया और 1732 में उज्जैन में उन्होंने फिर से मंदिर का निर्माण करा कर ज्योतिर्लिंग की स्थापना की। बताया जाता है कि राणोजी ने ही बाबा महाकाल ज्योतिर्लिंग को कोटि तीर्थ कुंड से बाहर निकालवाया था और महाकाल मंदिर का पुनः निर्माण करवाया था। यही नहीं राणोजी ने ही 500 बरस से बंद सिंहस्थ आयोजन को भी दोबारा शुरू कराया।

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मंदिर का पुनर्निर्माण में ये राजाओं के नाम
बता दें कि महाकवि कालिदास के ग्रंथ मेघदूत में महाकाल मंदिर की संध्या आरती का जिक्र मिलता है। साथ ही इस ग्रंथ में महाकाल वन की भी कल्पना की गई है। कहा जाता है कि उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने महाकाल मंदिर का विस्तार कराया था। राजा विक्रमदित्य ने मंदिर परिसर में धर्म सभा भी बनवाई, जहां से वह न्याय किया करते थे, राजा विक्रमादित्य ने कई प्रकार की प्रतिमाओं का भी निर्माण करवाया था। वहीं, 7वीं शताब्दी के बाण भट्ट के कादंबिनी में महाकाल मंदिर का विस्तार से वर्णन मिलता है। 11वीं शताब्दी में राजा भोज ने देश के कई मंदिरों का निर्माण करवाया था, जिसमे प्राचीन महाकाल मंदिर भी शामिल रहा। राजा भोज ने महाकाल मंदिर के शिखर को पहले से भी ऊंचा करवाया था।
मंदिर के विस्तार में राजस्थान के राजा जयसिंह द्वितीय का भी योगदान रहा। बताया जाता है की राजा जयसिंह ने 1280 में महाकाल के शिखर पर शिलालेख में सोने परत चढ़वाई थी। साथ ही उन्होंने कोटि तीर्थ का निर्माण कराया था। वहीं, 1300 ईस्वी में रणथम्भौर के राजा हमीर ने शिप्रा नदी में स्नान किया और बाबा महाकाल के दर्शन करने पहुंचे थे। उन्होंने महाकाल मंदिर की जीर्ण शीर्ण अवस्था को देखकर इसका विस्तार कराया। 1700 वीं शताब्दी में मेवाड़ के राजा जगत सिंह ने भी उज्जैन की तीर्थ यात्रा की और यहां कई निर्माण कार्य करवाए।

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क्यों माना जाता है महाकाल को उज्जैन का राजा
उज्जैन का एक ही राजा है और वह है महाकाल बाबा। विक्रमादित्य के शासन के बाद से यहां कोई भी राजा रात में नहीं रुक सकता। जिसने भी यह दुस्साहस किया है, वह संकटों से घिरकर मारा गया। पौराणिक तथा और सिंहासन बत्तीसी की कथा के अनुसार राजा भोज के काल से ही यहां कोई राजा नहीं रुकता है। वर्तमान में भी कोई भी राजा, मुख्‍यमंत्री और प्रधानमंत्री आदि यहां रात नहीं रुक सकता। राजा महाकाल श्रावण मास में प्रति सोमवार नगर भ्रमण करते हैं।
सम्राट विक्रमादित्य के जीवन से ही सिंहासन बत्तीसी और विक्रम वेताल नामक कथाएं जुड़ी हुई है। कहते हैं कि अवंतिका नगरी की रक्षा नगर के चारों और स्थित देवियां करती थीं, जो आज भी करती हैं। विक्रमादित्य को माता हरसिद्धि और माता बगलामुखी ने साक्षात दर्शन देकर उन्हें आशीर्वाद दिया था। मान्यता अनुसार उज्जैन के राजा महाकाल है और उन्हीं के अधिन रहकर कोई राजा राज करता था। विक्रमादित्य के जाने के बाद यहां के एकमात्र राजा अब महाकाल ही है। कहते हैं कि अवंतिका क्षेत्र में वही राजा रात रुक सकता है जो कि विक्रमादित्य जैसा न्यायप्रिय हो, अन्यथा उस पर काल मंडराने लगता है।
दरअसल, कहानी के अनुसार राजा भोज को सम्राट विक्रमादित्य का देवताओं का बनाया हुआ सिंहासन एक खेत से मिला था। सिंहासन के चारों ओर आठ-आठ पुतलियां यानी कुल बत्तीस पुतलियां खड़ी थीं। राजा भोज ने उसकी पूजा अर्चना की और उस पर बैठने के लिए पंडित से मुहूर्त निकालकर सभी को निमंत्रण दिया। लेकिन पूजा के बाद जैसे ही राजा ने अपना दाहिना पैर बढ़ाकर सिंहासन पर रखना चाहा कि सारी पुतलियां खिलखिला कर हंस पड़ी। लोगों को बड़ा अचंभा हुआ कि यह बेजान पुतलियां कैसे हंस पड़ी। राजा ने अपना पैर खींच लिया और पुतलियों से पूछा, ‘ओ सुंदर पुतलियों! सच-सच बताओं कि तुम क्यों हंसी?’
पहली पुतली का नाम था। रत्नमंजरी। राजा की बात सुनकर वह बोली, ‘राजन! आप बड़े तेजस्वी हैं, धनी हैं, बलवान हैं, लेकिन इन सब बातों का आपको घमंड भी है। जिस राजा का यह सिहांसन है, वह दानी, वीर और धनी होते हुए भी विनम्र थे। परम दयालु थे। राजा बड़े नाराज हुए।
पुतली ने समझाया, महाराज, यह सिंहासन परम प्रतापी और ज्ञानी राजा विक्रमादित्य का है। राजा बोले, मैं कैसे मानूं कि राजा विक्रमादित्य मुझसे ज्यादा गुणी और पराक्रमी थे? पुतली ने कहा, ‘ठीक है, मैं तुम्हें राजा विक्रमादित्य की एक कहानी सुनाती हूं।’ सिंहासन बत्तीसी की पहली पुतली रत्नमंजरी ने कहानी सुनाई। इसी तरह सभी 32 पुतलियों ने राजा विक्रमादित्य की कहानी सुनाने के बाद अंत में कहा कि इस सिंहासन पर वही राजा बैठ सकता है और यहां वही राज कर सकता जो राजा विक्रमादित्य की तरह हो, अन्यथा वह मारा जाएगा।… तभी से उज्जैन के राजा महाकाल है।

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