खुले स्थानों पर नमाज के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर गरमाए सियासी माहौल, शिया बोर्ड ने जताई कड़ी आपत्ति

Rashtrabaan

    इलाहाबाद हाईकोर्ट के खुले में नमाज पर दिए गए फैसले ने राजनीतिक हलकों में नया विवाद छेड़ दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि सार्वजनिक स्थानों पर बिना अनुमति नमाज पढ़ना कानूनन गलत होगा, ताकि सभी नागरिकों के अधिकारों का सम्मान किया जा सके। इस फैसले के बाद ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएसपीएलबी) के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने कड़ी आपत्ति जताई है।

    मौलाना यासूब अब्बास ने बताया कि सार्वजनिक जगहों पर रोजाना नमाज पढ़ना उनकी समुदाय की प्रथा नहीं है। उनका कहना है कि नमाज खासतौर पर जुमे, ईद और बकरीद जैसे त्योहारी अवसरों पर ही सार्वजनिक तौर पर अदा की जाती है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि कोर्ट को इस मामले में गलत जानकारी दी गई हो सकती है, जिसने फैसला प्रभावित किया।

    साथ ही मौलाना अब्बास ने भारी चिंता जताई कि शिया समुदाय के युवा हाल ही में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह सैयद अली खामेनेई की मृत्यु के बाद विभिन्न देशों में निशाने पर आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि यूएई, सऊदी अरब, कतर, ओमान, और बहरीन में शिया समुदाय के कुछ वर्गों को चुन-चुनकर परेशान किया जा रहा है।

    उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस दिशा में उन्होंने लखनऊ के सांसद एवं रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से व्यक्तिगत रूप से दिल्ली में मुलाकात कर इस मुद्दे को विदेश मंत्रालय तक पहुंचाने का आग्रह किया है।

    इस दौरान जामा मस्जिद लखनऊ के मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने भी इस फैसले पर प्रतिक्रिया दी। उनका मानना है कि कानून सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होना चाहिए और किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के कारण अन्य नागरिकों के अधिकारों में बाधा नहीं आनी चाहिए।

    मौलाना फिरंगी महली ने यह भी जोर दिया कि सार्वजनिक व्यवस्था और सामाजिक शांति बनाए रखने के लिए यह कदम आवश्यक है और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर सावधानी बरतनी होगी ताकि किसी प्रकार का द्वेष या असहिष्णुता न फैले।

    इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक दलों और धार्मिक संगठनों के बीच गंभीर बहस छिड़ गई है। कुछ राजनीतिक क्षेत्र इसपर धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन मान कर विरोध जताते दिख रहे हैं, वहीं कुछ इसे कानून व्यवस्था कायम रखने वाला जरूरी कदम मानकर सराहना कर रहे हैं।

    फैसले के आसपास बढ़ता तनाव और प्रतिक्रियाओं की वजह से आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और गहन चर्चा होने की संभावना है। नागरिकों और प्रशासन दोनों को इस मामले में संवेदनशीलता से काम लेना आवश्यक होगा, ताकि किसी भी प्रकार की सामाजिक भ्रांतियों से बचा जा सके और धार्मिक सद्भाव बना रहे।

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